मुस्लिम
रमज़ान की शुरुआत 2026 Ramadan Start
रोज़ों के महीने की शुरुआत
गुरुवार, 19 फ़रवरी 2026
तारीख चाँद दिखने पर निर्भर है और एक दिन आगे-पीछे हो सकती है। दफ़्तर त्योहार के पास घोषित तारीख मानते हैं।
चंद्र पंचांग: 19 फ़र 2026
1 रमज़ान 1447 हिजरी (इस्लामी हिजरी कैलेंडर)
हिजरी महीना नया चाँद दिखने पर शुरू होता है, इसलिए भारत में तारीख एक दिन आगे-पीछे हो सकती है।
रमज़ान हिजरी साल के नौवें महीने रमज़ान की 1 तारीख़ को, चाँद दिखने के बाद शुरू होता है।
रमज़ान की शुरुआत के साथ रोज़े, इबादत और दान का इस्लामी महीना शुरू होता है, जिसमें मुसलमान 29 या 30 दिन तक सुबह से सूर्यास्त तक रोज़ा रखते हैं, ईद-उल-फ़ित्र आने तक।
तारीख कैसे तय होती है: इस्लामी चंद्र कैलेंडर के नौवें महीने रमज़ान की 1 तारीख़; नया चाँद दिखने के अगले दिन सुबह से रोज़े शुरू होते हैं, इसलिए तारीख़ एक दिन आगे-पीछे हो सकती है
रमज़ान की शुरुआत क्यों मनाते हैं
रमज़ान इस्लामी साल का सबसे पवित्र महीना है। इस महीने का रोज़ा, जिसे सौम या रोज़ा कहते हैं, इस्लाम के पाँच स्तंभों में से एक है, बाक़ी चार हैं ईमान की गवाही (कलमा), रोज़ाना की नमाज़, ज़कात और हज। हर वयस्क मुसलमान, जो स्वस्थ और सक्षम हो, उससे रोज़ा रखने की अपेक्षा की जाती है।
रोज़ा केवल खाना-पानी छोड़ना नहीं है। मुसलमानों का मानना है कि यह आत्म-संयम, सब्र और शुक्रगुज़ारी सिखाता है। रोज़ेदार से यह भी अपेक्षा की जाती है कि वह ग़ुस्से, झूठ, चुग़ली और बुरी आदतों से बचे और नमाज़ व क़ुरान पढ़ने में ज़्यादा समय बिताए। हर दिन कुछ घंटे भूख महसूस करना उन लोगों की याद दिलाता है जो रोज़ भूखे रहते हैं, इसलिए ग़रीबों की मदद इस महीने का अहम हिस्सा बन जाती है।
मुसलमान यह भी मानते हैं कि क़ुरान पहली बार इसी महीने में पैग़ंबर मुहम्मद पर नाज़िल हुआ था। इसी कारण बहुत से लोग रमज़ान ख़त्म होने से पहले कम से कम एक बार पूरा क़ुरान पढ़ने की कोशिश करते हैं। महीने का अंत ईद-उल-फ़ित्र से होता है, जो शुक्राने और जश्न का दिन है।
रमज़ान की शुरुआत का इतिहास और कथा
इस्लामी परंपरा के अनुसार क़ुरान की पहली आयतें 610 ईस्वी में पैग़ंबर पर नाज़िल हुईं, जब वे मक्का के पास हिरा की गुफा में ध्यान कर रहे थे। उस रात को लैलतुल क़द्र, यानी शब-ए-क़द्र के रूप में याद किया जाता है, जिसे क़ुरान हज़ार महीनों से बेहतर बताता है। मुसलमान इसे रमज़ान के आख़िरी दस दिनों की विषम रातों में तलाशते हैं, ज़्यादातर 27वीं रात को।
पूरे महीने के रोज़े पैग़ंबर के मदीना जाने के दूसरे साल, लगभग 624 ईस्वी में फ़र्ज़ किए गए। क़ुरान ख़ुद मुख्य नियम बताता है: खाना-पीना तब तक करो जब तक सुबह का सफ़ेद धागा रात के काले धागे से अलग न दिखने लगे, फिर रात होने तक रोज़ा पूरा करो। यह बीमारों और मुसाफ़िरों को छूट भी देता है, जो छूटे हुए रोज़े बाद में रख सकते हैं।
चूँकि इस्लामी कैलेंडर चाँद पर चलता है, इसलिए इसका साल सौर वर्ष से लगभग ग्यारह दिन छोटा होता है। इसलिए रमज़ान लगभग 33 साल के चक्र में सभी मौसमों से गुज़रता है। 2026 में यह फ़रवरी और मार्च में है, जब भारत में दिन अपेक्षाकृत छोटे और मौसम हल्का होता है, इसलिए रोज़े पिछले सालों की लंबी गर्मियों के दिनों से आसान रहते हैं।
रमज़ान की शुरुआत कैसे मनाते हैं
महीना तब शुरू होता है जब 29 शाबान की शाम नया चाँद दिखता है। स्थानीय चाँद कमेटियाँ और धार्मिक संस्थाएँ शुरुआत का ऐलान करती हैं, इसलिए पहला रोज़ा भारत और खाड़ी देशों में, और कभी-कभी अलग-अलग इलाक़ों में भी, एक दिन आगे-पीछे हो सकता है।
हर दिन की शुरुआत सहरी से होती है, जो सुबह होने से पहले का भोजन है। परिवार आम तौर पर हल्का और पेट भरने वाला खाना लेते हैं, जैसे रोटी, पराठे, अंडे, दूध, खजूर और फल, और ख़ूब पानी पीते हैं। फ़ज्र की नमाज़ के बाद रोज़ा शुरू हो जाता है। तब से सूर्यास्त तक कुछ खाना, पीना या धूम्रपान नहीं किया जाता।
सूर्यास्त पर मग़रिब की अज़ान इफ़्तार का संकेत देती है। ज़्यादातर लोग खजूर और पानी से रोज़ा खोलते हैं, जैसा कहा जाता है कि पैग़ंबर करते थे, और फिर परिवार और पड़ोसियों के साथ फ्रूट चाट, पकौड़े, शरबत और दूसरे व्यंजन बाँटते हैं। रात की नमाज़ के बाद पुरुष और बहुत सी महिलाएँ तरावीह पढ़ते हैं, जो विशेष लंबी नमाज़ है, जिसमें अक्सर पूरे महीने में पूरा क़ुरान पढ़ा जाता है।
पूरे महीने दान पर ज़ोर रहता है। बहुत से लोग रमज़ान में ज़कात अदा करते हैं, जो बचत पर 2.5 प्रतिशत का सालाना दान है। ईद से पहले हर घर सदक़ा-ए-फ़ित्र देता है, जो एक छोटी तय रक़म है ताकि ग़रीब परिवार भी ईद मना सकें। कुछ धर्मनिष्ठ मुसलमान आख़िरी दस दिन एतिकाफ़ में बिताते हैं, यानी इबादत और चिंतन के लिए मस्जिद में ही रहते हैं।
बच्चों, बुज़ुर्गों, बीमारों, मुसाफ़िरों, गर्भवती और दूध पिलाने वाली माताओं और माहवारी के दौरान महिलाओं को छूट है। जो लोग बिल्कुल रोज़ा नहीं रख सकते, वे फ़िदया दे सकते हैं, यानी हर छूटे हुए दिन के बदले एक ग़रीब को खाना खिलाना।
महत्वपूर्ण दिन और पल
- चाँद देखना (29 शाबान की शाम, संभावित बुधवार, 18 फ़रवरी 2026)
कमेटियाँ नए चाँद को देखती हैं। चाँद दिख जाए तो उसी रात पहली तरावीह पढ़ी जाती है। - पहली सहरी और रोज़ा (सुबह होने से पहले, संभावित गुरुवार, 19 फ़रवरी 2026)
परिवार सुबह से पहले पहली सहरी करते हैं और महीने का पहला रोज़ा शुरू करते हैं। - पहला इफ़्तार (सूर्यास्त, 19 फ़रवरी 2026)
पहला रोज़ा खजूर और पानी से खोला जाता है, फिर मिलकर भोजन और मग़रिब की नमाज़ होती है। - शब-ए-क़द्र (लैलतुल क़द्र) (आख़िरी दस दिनों की विषम रातें, अक्सर 27वीं रात)
मुसलमान यह रात इबादत में बिताते हैं, यह मानते हुए कि इसी रात क़ुरान पहली बार नाज़िल हुआ था। - जुमात-उल-विदा (रमज़ान का आख़िरी जुमा, लगभग 13 मार्च 2026)
महीने की अलविदा जुमे की नमाज़ के लिए बड़ी जमातें जुटती हैं। - ईद-उल-फ़ित्र (अगला चाँद दिखने के बाद, लगभग 20 या 21 मार्च 2026)
रमज़ान ईद की नमाज़, नए कपड़ों, सेवइयों और परिवार व दोस्तों से मिलने के साथ ख़त्म होता है।
भारत भर में रमज़ान की शुरुआत
भारत दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादियों में से एक का घर है, और रमज़ान कई पुराने शहरी इलाक़ों की दिनचर्या बदल देता है। पुरानी दिल्ली में जामा मस्जिद के पास, मुंबई में मोहम्मद अली रोड, कोलकाता में ज़कारिया स्ट्रीट और हैदराबाद में चारमीनार के आसपास की शाम की खाने की गलियाँ देर रात तक गुलज़ार रहती हैं। हैदराबाद हलीम के लिए जाना जाता है, जो गेहूँ, दाल और गोश्त से धीमी आँच पर बनने वाला व्यंजन है। केरल में मस्जिदें इफ़्तार में नोंबू कंजी परोसती हैं, जो चावल का सुकून देने वाला दलिया है। लखनऊ अपनी शीरमाल और कबाबों के लिए मशहूर है।
कुछ पुराने मोहल्लों में आज भी टोलियाँ सुबह से पहले गलियों में घूमकर लोगों को सहरी के लिए जगाती हैं। मध्य प्रदेश के रायसेन किले में लंबे समय से सहरी और इफ़्तार के समय तोप दाग़ी जाती है। उत्तराखंड में देहरादून और हरिद्वार ज़िले की मस्जिदें, जिनमें रुड़की के पास पिरान कलियर का इलाक़ा भी शामिल है, सहरी और इफ़्तार के समय का ऐलान करती हैं, और सामूहिक इफ़्तार में अक्सर दूसरे धर्मों के पड़ोसी भी शामिल होते हैं।
अन्य नाम और संबंधित त्योहार
- पहला रोज़ा
- माह-ए-रमज़ान
- रमज़ान
- जमात-उल-विदा 20 मार्च 2026
- ईद-उल-फ़ित्र 21 मार्च 2026
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
2026 में रमज़ान की शुरुआत कब है?
रमज़ान की शुरुआत गुरुवार, 19 फ़रवरी 2026 को है। तारीख चाँद दिखने पर निर्भर है और एक दिन आगे-पीछे हो सकती है।
क्या रमज़ान की शुरुआत पर बैंक बंद रहते हैं?
2026 में यहाँ शामिल किसी भी राज्य में रमज़ान की शुरुआत बैंक अवकाश नहीं है, इसलिए बैंक खुले रहते हैं, जब तक उस दिन रविवार या दूसरा या चौथा शनिवार न हो।
क्या रमज़ान की शुरुआत केंद्र सरकार की छुट्टी है?
नहीं। 2026 में रमज़ान की शुरुआत केंद्र सरकार के दफ़्तरों की छुट्टी नहीं है।
क्या रमज़ान की शुरुआत पर शेयर बाज़ार बंद रहता है?
नहीं। 2026 में रमज़ान की शुरुआत NSE और BSE का ट्रेडिंग अवकाश नहीं है।
रमज़ान की शुरुआत के अन्य नाम क्या हैं?
रमज़ान की शुरुआत को पहला रोज़ा, माह-ए-रमज़ान और रमज़ान भी कहा जाता है।
रमज़ान हर साल अलग तारीख़ को क्यों शुरू होता है?
रमज़ान इस्लामी चंद्र कैलेंडर पर चलता है, जो सौर वर्ष से लगभग ग्यारह दिन छोटा है। इसलिए यह हर साल लगभग ग्यारह दिन पहले शुरू होता है और नया चाँद दिखने पर निर्भर करता है।
सहरी और इफ़्तार में क्या अंतर है?
सहरी वह भोजन है जो रोज़ा शुरू करने के लिए सुबह होने से पहले किया जाता है। इफ़्तार सूर्यास्त का वह भोजन है जिससे रोज़ा खोला जाता है।
रमज़ान में रोज़े से किसे छूट है?
बच्चों, बुज़ुर्गों, बीमारों, मुसाफ़िरों, गर्भवती या दूध पिलाने वाली महिलाओं और माहवारी के दौरान महिलाओं को छूट है। इनमें से ज़्यादातर बाद में रोज़े पूरे करते हैं, या न रख सकें तो फ़िदया देते हैं।
क्या भारत में रमज़ान की शुरुआत पर छुट्टी होती है?
नहीं। रमज़ान का पहला दिन सामान्य कामकाजी दिन होता है। छुट्टी महीने के अंत में ईद-उल-फ़ित्र पर होती है।
क्या भारत में पहला रोज़ा सऊदी अरब से अलग दिन हो सकता है?
हाँ। भारत में स्थानीय स्तर पर चाँद देखा जाता है, इसलिए भारत में पहला रोज़ा अक्सर खाड़ी देशों से एक दिन बाद होता है।
अगले 30 दिनों के मुस्लिम त्योहार
अगले 30 दिनों में कोई और त्योहार नहीं।
प्रमुख मुस्लिम त्योहार
- 21 मार्चशनिईद-उल-फ़ित्र
- 27 मईबुधईद-उल-अज़हा (बकरीद)
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