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ईद-उल-अज़हा (बकरीद) 2027 Eid-ul-Adha (Bakrid)

क़ुर्बानी का त्योहार

सोमवार, 17 मई 2027

तारीख चाँद दिखने पर निर्भर है और एक दिन आगे-पीछे हो सकती है। दफ़्तर त्योहार के पास घोषित तारीख मानते हैं।

चंद्र पंचांग: 17 मई 2027

10 ज़िल-हिज्जा 1448 हिजरी (इस्लामी हिजरी कैलेंडर)

हिजरी महीना नया चाँद दिखने पर शुरू होता है, इसलिए भारत में तारीख एक दिन आगे-पीछे हो सकती है।

ईद-उल-अज़हा हिजरी साल के आख़िरी महीने ज़िल-हिज्जा की 10 तारीख़ को, हज के दिनों में पड़ती है।

ईद-उल-अज़हा, जिसे भारत में बकरीद कहते हैं, अल्लाह के लिए क़ुर्बानी देने को तैयार हज़रत इब्राहीम की याद में मनाई जाती है। इस दिन ईद की नमाज़ होती है, जानवर की क़ुर्बानी दी जाती है और गोश्त ग़रीबों के साथ बाँटा जाता है।

तारीख कैसे तय होती है: इस्लामी चंद्र कैलेंडर के बारहवें महीने ज़िल-हिज्जा की 10वीं तारीख़; सटीक तारीख़ चाँद दिखने पर निर्भर करती है

ईद-उल-अज़हा (बकरीद) क्यों मनाते हैं

ईद-उल-अज़हा का अर्थ है क़ुर्बानी का त्योहार। ईद-उल-फ़ित्र के साथ यह इस्लाम के दो मुख्य त्योहारों में से एक है। मुसलमान हज़रत इब्राहीम के ईमान को याद करते हैं, जिन्हें बाइबिल में अब्राहम कहा गया है। वे अपनी सबसे प्यारी चीज़ क़ुर्बान करने को तैयार थे, क्योंकि उनका विश्वास था कि अल्लाह ने उनसे यही माँगा है। यह त्योहार अल्लाह पर पूरा भरोसा, फ़रमाँबरदारी और ऊँचे मक़सद के लिए अपना आराम छोड़ने की सीख देता है।

इस्लाम में क़ुर्बानी का मतलब ख़ून या गोश्त नहीं है। क़ुरआन कहता है कि इनमें से कुछ भी अल्लाह तक नहीं पहुँचता, केवल ईमान वाले का तक़वा पहुँचता है। इसलिए क़ुर्बानी, यानी इस रस्म के तहत दी जाने वाली बलि, का असली मक़सद तक़वा पैदा करना है, यानी हर काम में अल्लाह का ख़याल रखना। पड़ोसियों और ग़रीबों के साथ गोश्त बाँटना इस भक्ति को दूसरों की परवाह में बदल देता है। भारत के कई क़स्बों में अक्सर यही साल का वह मौक़ा होता है जब ग़रीब परिवारों को भरपूर गोश्त मिलता है।

यह त्योहार हज के दिनों में भी आता है, जो मक्का की सालाना तीर्थयात्रा है और जिसे हर वह मुसलमान जीवन में एक बार करे जो इसका ख़र्च उठा सकता हो। घर पर रहने वाले मुसलमान भी दिल से हाजियों के साथ जुड़ते हैं। ईद से एक दिन पहले अरफ़ा का दिन होता है, जो हज का सबसे अहम दिन है, और हज पर न गए बहुत से मुसलमान उस दिन रोज़ा रखते हैं।

भारत में आम तौर पर बोला जाने वाला नाम बकरीद लोकप्रिय रूप से "बकरा" शब्द से जोड़ा जाता है, क्योंकि भारत में सबसे ज़्यादा बकरों की ही क़ुर्बानी दी जाती है।

ईद-उल-अज़हा (बकरीद) का इतिहास और कथा

यह कहानी हज़रत इब्राहीम तक जाती है, जो इस्लाम से कई सदियों पहले हुए और जिनका यहूदी, ईसाई और मुसलमान सभी सम्मान करते हैं। इस्लामी परंपरा के अनुसार हज़रत इब्राहीम ने ख़्वाब में देखा कि वे अपने बेटे इस्माईल की क़ुर्बानी दे रहे हैं। उन्होंने बेटे को यह बताया, और इस्माईल राज़ी हो गए और कहा कि अब्बा वही करें जिसका अल्लाह ने हुक्म दिया है।

परंपरा के अनुसार शैतान ने तीन बार हज़रत इब्राहीम को रोकने की कोशिश की, और हर बार उन्होंने पत्थर मारकर उसे भगा दिया। जब हज़रत इब्राहीम यह काम करने ही वाले थे, तब अल्लाह ने पुकारा कि वे अपना ख़्वाब सच कर चुके हैं। बेटे की जगह एक मेढ़ा भेजा गया। क़ुरआन यह क़िस्सा सूरह अस-साफ़्फ़ात में बयान करता है और उस मेढ़े को एक बड़ी क़ुर्बानी बताता है।

मुसलमानों का विश्वास है कि बाद में हज़रत इब्राहीम और हज़रत इस्माईल ने मिलकर मक्का में काबा बनाया। हज की कई रस्में उनके परिवार की याद दिलाती हैं, जैसे मिना में खंभों पर कंकड़ मारना और सफ़ा व मरवा पहाड़ियों के बीच चलना, जो इस्माईल की माँ हज़रत हाजरा के पानी की तलाश की याद है। पैग़ंबर मुहम्मद ने मदीना हिजरत के बाद ईद-उल-अज़हा को त्योहार के रूप में शुरू किया, और ईद की नमाज़ के बाद क़ुर्बानी की परंपरा उन्हीं के तरीक़े से आई है।

ईद-उल-अज़हा (बकरीद) कैसे मनाते हैं

तैयारियाँ कई दिन पहले शुरू हो जाती हैं। परिवार नए कपड़े ख़रीदते हैं, और क़ुर्बानी के जानवरों की बिक्री के लिए बाज़ार लगते हैं। जानवर सेहतमंद होना चाहिए और इस्लामी नियमों में तय कम से कम उम्र का होना चाहिए। भारत में बकरे और भेड़ सबसे आम हैं।

ईद की सुबह मुसलमान ग़ुस्ल करते हैं, साफ़ या नए कपड़े पहनते हैं और इत्र लगाते हैं। ईद-उल-फ़ित्र के उलट, नमाज़ से पहले कुछ न खाने का रिवाज है। लोग तकबीर, "अल्लाहु अकबर, अल्लाहु अकबर, ला इलाहा इल्लल्लाह", पढ़ते हुए ईदगाह या मस्जिद जाते हैं। ईद की नमाज़ दो रकअत की होती है, जिसके बाद ख़ुतबा होता है। इसके बाद लोग गले मिलते हैं और एक दूसरे को "ईद मुबारक" कहते हैं।

नमाज़ के बाद परिवार क़ुर्बानी करते हैं। सही तरीक़ा जानने वाला व्यक्ति अल्लाह के नाम पर जानवर की क़ुर्बानी करता है। गोश्त आम तौर पर तीन हिस्सों में बाँटा जाता है: एक परिवार के लिए, एक रिश्तेदारों और दोस्तों के लिए, और एक ग़रीबों और ज़रूरतमंदों के लिए। क़ुर्बानी ईद के दिन और उसके बाद के दो दिनों में की जा सकती है। जो परिवार घर पर क़ुर्बानी नहीं कर सकते, वे अक्सर किसी मस्जिद या सामुदायिक समूह के ज़रिए बड़े जानवर में हिस्सा लेते हैं।

बाक़ी दिन परिवार और मेहमानों के साथ खाने का होता है। घरों में बिरयानी, कबाब, क़ोरमा, निहारी और शीर ख़ुरमा व सेवइयाँ जैसी मिठाइयाँ परोसी जाती हैं। बच्चों को बड़ों से ईदी, यानी पैसों के छोटे तोहफ़े, मिलते हैं। मुसलमान अरफ़ा के दिन की सुबह से ईद के चौथे दिन की दोपहर तक हर फ़र्ज़ नमाज़ के बाद तकबीर भी पढ़ते हैं।

भारतीय मुसलमान क़ुर्बानी के बारे में स्थानीय क़ानूनों और नगर नियमों का पालन करते हैं। कई शहर इसके लिए मंज़ूरशुदा जगहें तय करते हैं और परिवारों से गलियाँ साफ़ रखने और कचरे का सही निपटारा करने को कहते हैं।

महत्वपूर्ण दिन और पल

  1. अरफ़ा का दिन (9 ज़िल-हिज्जा, ईद से एक दिन पहले)
    हज का मुख्य दिन। हज पर न गए मुसलमान अक्सर नफ़्ल रोज़ा रखते हैं और इबादत में वक़्त बिताते हैं।
  2. ईद की नमाज़ (ईद की सुबह, सूर्योदय के बाद)
    ईदगाह या मस्जिद में दो रकअत की सामूहिक नमाज़, जिसके बाद ख़ुतबा और ईद की मुबारकबाद।
  3. क़ुर्बानी (ईद की नमाज़ के बाद, तीन दिनों तक)
    बकरे, भेड़ या किसी दूसरे जायज़ जानवर की क़ुर्बानी, और गोश्त परिवार, दोस्तों और ग़रीबों में बाँटा जाता है।
  4. परिवार की दावतें (ईद का दिन और उसके बाद के दिन)
    रिश्तेदार मिलने आते हैं, बच्चों को ईदी मिलती है, और घरों में बिरयानी, कबाब और शीर ख़ुरमा परोसा जाता है।

भारत भर में ईद-उल-अज़हा (बकरीद)

दिल्ली में लाखों नमाज़ी जामा मस्जिद में नमाज़ पढ़ते हैं, और लखनऊ में ऐशबाग़ ईदगाह में भारी भीड़ जुटती है। हैदराबाद का पुराना शहर और मुंबई का मोहम्मद अली रोड खाने के स्टॉलों से गुलज़ार हो जाते हैं। केरल में इस त्योहार को बलि पेरुन्नाल या वलिया पेरुन्नाल, यानी बड़ा त्योहार, कहते हैं, और परिवार घी चावल और पत्तिरी जैसे पकवान बनाते हैं।

उत्तराखंड में देहरादून के मुसलमान शहर की ईदगाह और मुख्य मस्जिदों में नमाज़ के लिए जुटते हैं, और रुड़की, हल्द्वानी और ऊधम सिंह नगर जैसे शहरों में बड़ी जमातें होती हैं।

अन्य नाम और संबंधित त्योहार

  • बकरी ईद
  • बकरीद
  • बलि पेरुन्नाल
  • ईद अल-अज़हा
  • ईद-उल-ज़ुहा
  • क़ुर्बानी का त्योहार

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

2027 में ईद-उल-अज़हा (बकरीद) कब है?

ईद-उल-अज़हा (बकरीद) सोमवार, 17 मई 2027 को है। तारीख चाँद दिखने पर निर्भर है और एक दिन आगे-पीछे हो सकती है।

क्या ईद-उल-अज़हा (बकरीद) पर बैंक बंद रहते हैं?

2027 की RBI बैंक अवकाश सूचियाँ अभी जारी नहीं हुई हैं; ये आमतौर पर दिसंबर या जनवरी में आती हैं। हर राज्य की अपनी सूची होती है, इसलिए तब अपने राज्य का बैंक अवकाश पेज देखें।

क्या ईद-उल-अज़हा (बकरीद) केंद्र सरकार की छुट्टी है?

हाँ। ईद-उल-अज़हा (बकरीद) 2027 में केंद्र सरकार के सभी दफ़्तरों की अनिवार्य छुट्टियों में से एक है।

ईद-उल-अज़हा (बकरीद) के अन्य नाम क्या हैं?

ईद-उल-अज़हा (बकरीद) को बकरी ईद, बकरीद, बलि पेरुन्नाल, ईद अल-अज़हा, ईद-उल-ज़ुहा और क़ुर्बानी का त्योहार भी कहा जाता है।

बकरीद क्यों मनाई जाती है?

बकरीद हज़रत इब्राहीम की उस तैयारी की याद में मनाई जाती है, जब वे अपने बेटे इस्माईल की क़ुर्बानी देने को तैयार हो गए, क्योंकि उनका विश्वास था कि अल्लाह ने यही हुक्म दिया है। मुसलमानों का विश्वास है कि अल्लाह ने उनकी जगह एक मेढ़े की क़ुर्बानी क़बूल की, और यह त्योहार उसी ईमान और फ़रमाँबरदारी का उत्सव है।

बकरीद की तारीख़ हर साल क्यों बदलती है?

बकरीद इस्लामी चंद्र कैलेंडर में ज़िल-हिज्जा की 10 तारीख़ को पड़ती है। चंद्र वर्ष सौर वर्ष से लगभग 11 दिन छोटा होता है, और हर महीना नया चाँद दिखने से शुरू होता है।

क़ुर्बानी का गोश्त कैसे बाँटा जाता है?

गोश्त आम तौर पर तीन हिस्सों में बाँटा जाता है। एक हिस्सा परिवार के पास रहता है, एक रिश्तेदारों और दोस्तों को जाता है, और एक ग़रीबों को।

ईद-उल-फ़ित्र और ईद-उल-अज़हा में क्या फ़र्क़ है?

ईद-उल-फ़ित्र रमज़ान के रोज़ों के महीने के ख़त्म होने पर आती है और इसमें फ़ितरा नाम का दान दिया जाता है। ईद-उल-अज़हा इसके लगभग सत्तर दिन बाद, हज के दिनों में आती है, और इसमें जानवर की क़ुर्बानी दी जाती है।

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