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मीलाद-उन-नबी (ईद-ए-मीलाद) 2027 Milad-un-Nabi (Eid-e-Milad)

पैग़ंबर मुहम्मद का जन्मदिन

रविवार, 15 अगस्त 2027

तारीख चाँद दिखने पर निर्भर है और एक दिन आगे-पीछे हो सकती है। दफ़्तर त्योहार के पास घोषित तारीख मानते हैं।

चंद्र पंचांग: 15 अग 2027

12 रबी-उल-अव्वल 1449 हिजरी (इस्लामी हिजरी कैलेंडर)

हिजरी महीना नया चाँद दिखने पर शुरू होता है, इसलिए भारत में तारीख एक दिन आगे-पीछे हो सकती है।

मीलाद-उन-नबी हिजरी साल के तीसरे महीने रबी-उल-अव्वल की 12 तारीख़ को मनाया जाता है।

मीलाद-उन-नबी पैग़ंबर मुहम्मद की पैदाइश की सालगिरह है, जिसे बहुत से मुसलमान दुआ, उनकी ज़िंदगी पर होने वाली महफ़िलों, जुलूस और ख़ैरात के साथ मनाते हैं।

तारीख कैसे तय होती है: इस्लामी चंद्र कैलेंडर के तीसरे महीने रबी-उल-अव्वल की 12 तारीख़; सही तारीख़ चाँद दिखने पर निर्भर करती है

मीलाद-उन-नबी (ईद-ए-मीलाद) क्यों मनाते हैं

मीलाद-उन-नबी वह दिन है जब बहुत से मुसलमान पैग़ंबर मुहम्मद की ज़िंदगी और उनकी तालीमात को याद करते हैं, जिन्हें वे अल्लाह का आख़िरी रसूल मानते हैं। ज़ोर उनके किरदार पर होता है: उनकी ईमानदारी, ग़रीबों और यतीमों पर उनकी रहमत, मुश्किलों में उनका सब्र और एक ख़ुदा की इबादत का उनका पैग़ाम। महफ़िलों में वक्ता सुनने वालों से कहते हैं कि वे रोज़मर्रा की ज़िंदगी में, कारोबार के लेन-देन में, परिवार में और पड़ोसियों से अच्छे बर्ताव में उनकी मिसाल पर चलें।

"मीलाद" का मतलब है पैदाइश और "नबी" का मतलब है पैग़ंबर। उत्तर भारत के ज़्यादातर हिस्सों में इस दिन को बारावफ़ात भी कहते हैं। मुस्लिम परंपरा के अनुसार पैग़ंबर की पैदाइश और उनका इंतक़ाल, दोनों रबी-उल-अव्वल के महीने में हुए, और कई रिवायतें उनके इंतक़ाल की तारीख़ 12 बताती हैं, इसलिए इस दिन में ख़ुशी और चिंतन, दोनों का भाव होता है।

हर मुस्लिम समूह यह दिन एक ही तरह से नहीं मनाता। बरेलवी और सूफ़ी परंपरा के सुन्नी मुसलमान इसे बड़े पैमाने पर मनाते हैं। शिया मुसलमान आमतौर पर पैदाइश रबी-उल-अव्वल की 17 तारीख़ को मनाते हैं। देवबंदी और अहल-ए-हदीस उलमा जैसे कुछ समूह औपचारिक जश्न को दीन में बाद में जुड़ी चीज़ मानते हैं और इस दिन को आम दिन की तरह रखना पसंद करते हैं, जबकि पूरे साल पैग़ंबर का सम्मान करते हैं।

मीलाद-उन-नबी (ईद-ए-मीलाद) का इतिहास और कथा

इस्लामी परंपरा में दर्ज है कि पैग़ंबर मुहम्मद का जन्म लगभग 570 ईसवी में मक्का में हुआ था, जिस साल को अरब आमुल फ़ील यानी हाथी का साल कहते थे। वे क़ुरैश क़बीले के बनू हाशिम ख़ानदान से थे। उनके वालिद अब्दुल्लाह का इंतक़ाल उनकी पैदाइश से पहले हो गया था और उनकी वालिदा आमिना का तब, जब वे लगभग छह साल के थे, इसलिए उनकी परवरिश पहले उनके दादा अब्दुल मुत्तलिब ने और फिर उनके चाचा अबू तालिब ने की।

उन्होंने व्यापारी के रूप में काम किया और मक्का में अल-अमीन, यानी भरोसेमंद, के नाम से मशहूर हुए। मुसलमानों का मानना है कि लगभग चालीस साल की उम्र में उन्हें हिरा की गुफा में क़ुरआन की पहली वही मिली। उन्होंने बरसों मक्का में दीन की दावत दी, 622 ईसवी में मदीना हिजरत की, जिस घटना से इस्लामी कैलेंडर शुरू होता है, और 632 ईसवी में मदीना में उनका इंतक़ाल हुआ।

इस्लाम की शुरुआती पीढ़ियों में पैग़ंबर की पैदाइश का दिन सार्वजनिक रूप से नहीं मनाया जाता था। संगठित जश्न बाद में शुरू हुए। इतिहासकार मिस्र के फ़ातिमी शासकों का, और 13वीं शताब्दी की शुरुआत में इरबिल के शासक मुज़फ़्फ़रुद्दीन गोकबोरी का ज़िक्र करते हैं, जो शायरी और दावतों के साथ बड़े सार्वजनिक जलसे करते थे। वहाँ से यह रिवाज पूरी मुस्लिम दुनिया में फैला, भारत में भी, जहाँ सूफ़ी दरगाहों ने इसे आकार देने में बड़ी भूमिका निभाई।

मीलाद-उन-नबी (ईद-ए-मीलाद) कैसे मनाते हैं

दिन की शुरुआत अक्सर फ़ज्र की नमाज़ और क़ुरआन की तिलावत से होती है। मस्जिदों और घरों को रोशनी और हरे झंडों से सजाया जाता है, और कुछ घरों में महीने की शुरुआत से ही सजावट हो जाती है। मीलाद या महफ़िल-ए-मीलाद कहलाने वाली मज़हबी महफ़िलों में पैग़ंबर की ज़िंदगी पर तक़रीरें होती हैं, उनकी शान में नात और क़सीदे पढ़े जाते हैं, और बार-बार सलवात, यानी उन पर दरूद, पढ़ा जाता है।

कई शहरों में मुसलमान जुलूस निकालते हैं, जिसमें बैनर होते हैं, कलाम पढ़े जाते हैं और मदीना में पैग़ंबर की मस्जिद के गुंबद-ए-ख़िज़रा के मॉडल होते हैं। स्थानीय प्रशासन आमतौर पर आयोजकों के साथ मिलकर रास्ता पहले से तय करता है।

ख़ैरात इस दिन का केंद्र है। लोग पड़ोसियों और ग़रीबों में खाना बाँटते हैं, जिसे अक्सर नियाज़ या तबर्रुक कहा जाता है। खीर, बिरयानी, ज़र्दा और मिठाइयाँ आमतौर पर बनाई जाती हैं। कई परिवार दरगाहों पर भी जाते हैं और यतीमख़ानों और मदरसों को दान देते हैं।

मुस्लिम ट्रस्टों के चलाए स्कूल अक्सर मीलाद-उन-नबी से पहले के दिनों में पैग़ंबर की ज़िंदगी पर क्विज़, निबंध लेखन और तिलावत की प्रतियोगिताएँ कराते हैं। कुछ समूह रक्तदान शिविर और मुफ़्त स्वास्थ्य जाँच शिविर लगाते हैं, जिसे वे लोगों की ख़िदमत की उनकी तालीम पर अमल का व्यावहारिक तरीक़ा बताते हैं।

महत्वपूर्ण दिन और पल

  1. चाँद दिखना (रबी-उल-अव्वल की शुरुआत, लगभग 12 दिन पहले)
    हिलाल दिखने के बाद मज़हबी कमेटियाँ महीने की शुरुआत का ऐलान करती हैं। इसी से मीलाद-उन-नबी की तारीख़ तय होती है।
  2. महफ़िल-ए-मीलाद (एक रात पहले और उस दिन)
    मस्जिदों और घरों में महफ़िलें, जिनमें पैग़ंबर की ज़िंदगी पर तक़रीरें, नात ख़्वानी और सलवात होती है।
  3. जुलूस (26 अगस्त 2026 (बुधवार), संभावित)
    बैनरों, कलाम और सजी हुई झाँकियों के साथ जुलूस स्थानीय प्रशासन से तय रास्तों पर मुख्य सड़कों से गुज़रते हैं।
  4. खाना और ख़ैरात (दिन भर)
    परिवार पड़ोसियों और ग़रीबों में खाना बाँटते हैं और यतीमख़ानों और मदरसों को दान देते हैं।

भारत भर में मीलाद-उन-नबी (ईद-ए-मीलाद)

श्रीनगर में हज़रतबल दरगाह पर एक पवित्र अवशेष, जिसे पैग़ंबर का बाल माना जाता है, ज़ायरीन के दीदार के लिए रखा जाता है, और इसके लिए बहुत भारी भीड़ जुटती है। हैदराबाद, लखनऊ, बरेली, मुंबई और कोलकाता में बड़े जुलूस निकलते हैं और गलियाँ रोशनी से जगमगाती हैं। केरल में इस दिन को नबी दिनम कहते हैं, और मदरसों के बच्चे जुलूसों में हिस्सा लेते हैं और अरबी और मलयालम कविताएँ पढ़ते हैं।

उत्तराखंड में देहरादून, रुड़की, हल्द्वानी जैसे शहरों और पूरे हरिद्वार ज़िले में जुलूस निकाले जाते हैं। कई लोग रुड़की के पास पिरान कलियर में साबिर पाक की दरगाह पर भी जाते हैं।

अन्य नाम और संबंधित त्योहार

  • बारावफ़ात
  • ईद-ए-मीलाद
  • मौलिद
  • नबी दिनम

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

2027 में मीलाद-उन-नबी (ईद-ए-मीलाद) कब है?

मीलाद-उन-नबी (ईद-ए-मीलाद) रविवार, 15 अगस्त 2027 को है। तारीख चाँद दिखने पर निर्भर है और एक दिन आगे-पीछे हो सकती है।

क्या मीलाद-उन-नबी (ईद-ए-मीलाद) पर बैंक बंद रहते हैं?

2027 की RBI बैंक अवकाश सूचियाँ अभी जारी नहीं हुई हैं; ये आमतौर पर दिसंबर या जनवरी में आती हैं। हर राज्य की अपनी सूची होती है, इसलिए तब अपने राज्य का बैंक अवकाश पेज देखें।

क्या मीलाद-उन-नबी (ईद-ए-मीलाद) केंद्र सरकार की छुट्टी है?

हाँ। मीलाद-उन-नबी (ईद-ए-मीलाद) 2027 में केंद्र सरकार के सभी दफ़्तरों की अनिवार्य छुट्टियों में से एक है।

मीलाद-उन-नबी (ईद-ए-मीलाद) के अन्य नाम क्या हैं?

मीलाद-उन-नबी (ईद-ए-मीलाद) को बारावफ़ात, ईद-ए-मीलाद, मौलिद और नबी दिनम भी कहा जाता है।

मीलाद-उन-नबी क्यों मनाया जाता है?

यह पैग़ंबर मुहम्मद की पैदाइश की सालगिरह है। इसे मनाने वाले मुसलमान दुआ, महफ़िलों और ख़ैरात के ज़रिए उनकी ज़िंदगी और तालीमात को याद करते हैं।

इसे बारावफ़ात क्यों भी कहते हैं?

परंपरा के अनुसार पैग़ंबर का इंतक़ाल भी रबी-उल-अव्वल की 12 तारीख़ को हुआ था। उत्तर भारत में इस दिन को अक्सर बारावफ़ात कहते हैं, "बारा" यानी बारह और "वफ़ात" यानी इंतक़ाल से।

तारीख़ क्यों बदल सकती है?

इस्लामी कैलेंडर चंद्र कैलेंडर है और हर महीना नया चाँद दिखने से शुरू होता है। 2026 के लिए 26 अगस्त की तारीख़ संभावित है, लेकिन यह एक दिन आगे-पीछे हो सकती है।

क्या सभी मुसलमान मीलाद-उन-नबी मनाते हैं?

नहीं। बहुत से सुन्नी और सूफ़ी मुसलमान इसे मनाते हैं, जबकि शिया मुसलमान पैदाइश 17 रबी-उल-अव्वल को मनाते हैं और कुछ समूह औपचारिक जश्न नहीं करते।

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