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दीयादिवाली 2026 Diwali

रोशनी का त्योहार

रविवार, 8 नवंबर 2026

2027 में: शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2027

चंद्र पंचांग: 8 नवं 2026

अमावस्या (15), कृष्ण पक्ष (नया चाँद)

माह: कार्तिक (पूर्णिमांत, उत्तर भारत), आश्विन (अमांत)

विक्रम संवत 2083 · शक संवत 1948

हिंदू महीनों के नाम दो तरह से रखे जाते हैं। उत्तर भारत (पूर्णिमांत) में महीना पूर्णिमा पर ख़त्म होता है और इस रात को कार्तिक अमावस्या कहते हैं; गुजरात, महाराष्ट्र और दक्षिण भारत (अमांत) में महीना अमावस्या पर ख़त्म होता है और इसे आश्विन अमावस्या कहते हैं।

रोशनी का त्योहार दिवाली अंधकार पर प्रकाश की जीत का उत्सव है। कार्तिक की अमावस्या की रात लक्ष्मी पूजा होती है, दीयों की कतारें जलती हैं, मिठाइयाँ बँटती हैं और पूरा परिवार एक साथ जुटता है।

तारीख कैसे तय होती है: पूर्णिमांत पंचांग में हिंदू माह कार्तिक की अमावस्या (अमांत पंचांग में आश्विन की अमावस्या)

धनुष लिए कमल पर खड़े भगवान राम, पीछे दीयों और आतिशबाज़ी से जगमगाती अयोध्या नगरी
रावण पर विजय के बाद भगवान राम अयोध्या लौटते हैं, और नगर उनके स्वागत में दीये जलाता है। ICC Holidays, मौलिक चित्र, अपना काम, श्रेय के साथ दोबारा उपयोग के लिए मुक्त

लक्ष्मी पूजा (प्रदोष काल) मुहूर्त

वर्षतारीखमुहूर्तअवधि
2026रवि, 8 नवंशाम 5:48 से शाम 7:14 तक1 घंटे 26 मिनट
2027शुक्र, 29 अक्टूशाम 5:55 से शाम 7:21 तक1 घंटे 26 मिनट

समय नई दिल्ली के लिए है और हर शहर में कुछ मिनट बदलता है। देहरादून या अपने शहर का स्थानीय पंचांग देखें।

दिवाली: दिन-ब-दिन 2026

दिन2026क्या होता है
धनतेरसशुक्र, 6 नवंसोना, चाँदी या नए बर्तन ख़रीदना; शाम को दरवाज़े पर यम के लिए दीया।
नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली)रवि, 8 नवंसुबह जल्दी तेल स्नान और कुछ दीये; नरकासुर पर कृष्ण की विजय।
दिवाली (लक्ष्मी पूजा)रवि, 8 नवंसूर्यास्त के बाद लक्ष्मी और गणेश की पूजा, पूरे घर में दीये।
गोवर्धन पूजा (अन्नकूट)मंगल, 10 नवंकृष्ण को अन्नकूट का भोग; बलिप्रतिपदा और गुजराती नववर्ष।
भाई दूजबुध, 11 नवंबहनें तिलक लगाती हैं और भाइयों के लिए प्रार्थना करती हैं।

तारीखें नई दिल्ली के पंचांग के अनुसार हैं। 2026 की कुछ सरकारी सूचियों में नरक चतुर्दशी 7 नवंबर और गोवर्धन पूजा 9 नवंबर को रखी गई है।

दिवाली के पाँच दिन: धनतेरस, छोटी दिवाली, लक्ष्मी पूजा, गोवर्धन पूजा और भाई दूज
दिवाली के पाँच दिन। ICC Holidays, मौलिक चित्र

दिवाली क्यों मनाते हैं

दिवाली, जिसे दीपावली भी लिखा जाता है, भारत में सबसे ज़्यादा मनाया जाने वाला त्योहार है। यह शब्द संस्कृत के "दीपावली" से बना है, जिसका अर्थ है दीपों की पंक्ति। यह त्योहार अमावस्या को आता है, जो चंद्र मास की सबसे अँधेरी रात होती है, और इसका भाव भी यही है: जिस रात चाँद की ज़रा भी रोशनी नहीं होती, उसी रात परिवार दीये जलाकर दिखाते हैं कि प्रकाश अंधकार को, सत्य असत्य को और ज्ञान अज्ञान को हरा सकता है।

हिंदू घरों में इस त्योहार का केंद्र लक्ष्मी पूजा है। लक्ष्मी धन, समृद्धि और सुख की देवी हैं, और उनकी पूजा भगवान गणेश के साथ होती है, जिनका आवाहन हर पूजा में विघ्न दूर करने के लिए सबसे पहले किया जाता है। मान्यता है कि लक्ष्मी साफ़-सुथरे, रोशन और स्वागत करने वाले घरों में आती हैं, इसलिए दिवाली से पहले के हफ़्ते घर की सफ़ाई, मरम्मत और सजावट में बीतते हैं।

दिवाली कारोबार के लिए भी नई शुरुआत है। कई व्यापारी दुकान पर पूजा के बाद पुराने हिसाब के खाते बंद करके नए बही-खाते शुरू करते हैं। गुजरात में और कई मारवाड़ी परिवारों में दिवाली के अगले दिन से नया कारोबारी वर्ष शुरू होता है।

सबसे बढ़कर, दिवाली परिवार का त्योहार है। लोग लंबी दूरी तय करके घर पहुँचते हैं, रिश्तेदारों से मिलते हैं, मिठाइयाँ और उपहार बाँटते हैं, ज़रूरतमंदों की मदद करते हैं और जिनसे अनबन हुई हो, उनसे सुलह करते हैं।

दिवाली का इतिहास और कथा

इस रात दीये जलाने के पीछे कई परंपराएँ हैं। सबसे प्रसिद्ध कथा रामायण से है: चौदह वर्ष के वनवास और रावण पर विजय के बाद भगवान राम, सीता और लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौटे, और नगरवासियों ने उनके स्वागत में गलियों को दीयों से सजा दिया। एक और मान्यता है कि देवी लक्ष्मी इसी अमावस्या को समुद्र मंथन से प्रकट हुईं और उन्होंने भगवान विष्णु को पति के रूप में चुना। दक्षिण भारत के बड़े हिस्से में यह त्योहार भगवान कृष्ण और सत्यभामा द्वारा नरकासुर के वध से जुड़ा है, इसलिए वहाँ मुख्य उत्सव नरक चतुर्दशी की सुबह होता है।

दूसरे धर्मों के लोग भी इन्हीं दिनों को अपने कारणों से मनाते हैं। जैन धर्म के अनुयायी बिहार के पावापुरी में 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर के निर्वाण को याद करते हैं, और कई जैन परिवार अपना नया वर्ष यहीं से शुरू करते हैं। सिख बंदी छोड़ दिवस मनाते हैं, जो ग्वालियर के किले से गुरु हरगोबिंद जी की रिहाई की याद दिलाता है, और इस अवसर पर अमृतसर का स्वर्ण मंदिर रोशनी से जगमगा उठता है। बंगाल, ओडिशा और असम में यही रात काली पूजा को समर्पित है।

यह त्योहार सदियों पुराना है। राजा हर्ष के सातवीं शताब्दी के एक संस्कृत नाटक में इस मौसम में दीपों के उत्सव का उल्लेख है, और ग्यारहवीं शताब्दी के विद्वान अल-बिरूनी ने भारत के अपने वृत्तांत में दिवाली का वर्णन किया है। आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती का देहांत 1883 में दिवाली के दिन हुआ था, और आर्य समाज इस दिन उन्हें याद करता है।

श्री राम, सीता, लक्ष्मण और हनुमान पुष्पक विमान से अयोध्या पहुँचते हैं और लोग दीयों की कतारें जलाते हैं
रावण की पराजय के बाद श्री राम अयोध्या लौटते हैं, और नगर दीयों से उनका स्वागत करता है। ICC Holidays, मौलिक चित्र

दिवाली कैसे मनाते हैं

तैयारियाँ हफ़्तों पहले शुरू हो जाती हैं। घरों की ऊपर से नीचे तक सफ़ाई होती है, दीवारों पर सफ़ेदी या रंग-रोगन होता है और टूटी-फूटी चीज़ें बाहर कर दी जाती हैं। बाज़ार कपड़े, बर्तन, मिठाइयाँ, बिजली की लड़ियाँ और उपहार ख़रीदने वालों से भर जाते हैं।

मुख्य शाम को घर के प्रवेश द्वार पर रंगोली बनाई जाती है, दरवाज़े पर गेंदे और आम के पत्तों का तोरण लगाया जाता है और बालकनी को रोशनी की लड़ियों से सजाया जाता है। सूर्यास्त के बाद, जिस समय को प्रदोष काल कहते हैं, पूरा परिवार लक्ष्मी पूजा के लिए इकट्ठा होता है। लकड़ी की चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर लक्ष्मी और गणेश की मूर्तियाँ या चित्र रखे जाते हैं, अक्सर देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर के साथ। देवताओं के सामने आम के पत्तों और नारियल से सजा जल का कलश, चाँदी के सिक्के, गहने, बही-खाते और मिठाई की थाली रखी जाती है। पूजा दीप जलाने, संकल्प, आवाहन और फूल, रोली, चावल, खील और बताशे अर्पित करने से आगे बढ़ती है और अंत में सब मिलकर आरती गाते हैं।

पूजा के बाद हर दरवाज़े, खिड़की, सीढ़ी और कोने पर दीये रखे जाते हैं, गेट और रसोई में भी, ताकि घर का कोई हिस्सा अँधेरा न रहे। कई परिवार घी का एक दीया पूरी रात जलाए रखते हैं। बड़े छोटों को आशीर्वाद देते हैं और पड़ोसियों के साथ मिठाइयाँ बाँटी जाती हैं।

पटाखे लंबे समय से इस रात का हिस्सा रहे हैं, लेकिन वायु प्रदूषण के कारण अदालतें और कई राज्य सरकारें अब पटाखों पर रोक लगाती हैं। अक्सर तय समय के लिए केवल ग्रीन पटाखों की अनुमति होती है और कुछ शहरों में पूरी तरह प्रतिबंध रहता है। अब कई परिवार केवल दीयों वाली दिवाली मनाना पसंद करते हैं।

दिवाली की रात एक दरवाज़े पर दीये, रंगोली, गेंदे का तोरण और लक्ष्मी के पदचिह्न
दिवाली की रात दरवाज़े पर दीये, रंगोली, गेंदे का तोरण और लक्ष्मी के पदचिह्न। ICC Holidays, मौलिक चित्र

दिवाली के प्रतीक, पकवान और रीति-रिवाज

दीया दिवाली का मुख्य प्रतीक है: सरसों के तेल या घी और रुई की बाती वाला मिट्टी का छोटा दीपक। हर दीया उस भीतरी रोशनी का प्रतीक है जो अज्ञान और भय को दूर रखती है। दरवाज़े पर रंगीन पाउडर, चावल के आटे या फूलों की पंखुड़ियों से बनी रंगोली मेहमानों और देवी का स्वागत करती है। कुमाऊँ में यही काम ऐपण करता है।

घर के अंदर आते हुए बनाए गए लक्ष्मी के छोटे पदचिह्न, दरवाज़े के पास सिंदूर से लिखा स्वस्तिक और "शुभ लाभ", और सिक्कों से भरा कलश, ये सब समृद्धि को बुलावा देते हैं। खील (मुरमुरे जैसे भुने धान) और बताशे पारंपरिक प्रसाद हैं, साथ में गन्ना और सिंघाड़े जैसे मौसमी फल भी चढ़ाए जाते हैं।

पकवान इस त्योहार का आधा हिस्सा हैं। घरों में काजू कतली, बेसन और मोतीचूर के लड्डू, बर्फ़ी, गुझिया और सोन पापड़ी बनाई या ख़रीदी जाती है, साथ में मठरी, नमक पारे और चकली जैसे नमकीन भी। दक्षिण में मुरुक्कु और अधिरसम आम हैं। मिठाई और सूखे मेवों के डिब्बे परिवारों, दोस्तों और सहकर्मियों के बीच सबसे आम उपहार हैं।

मुख्य दिन नए कपड़े पहने जाते हैं। धनतेरस पर बहुत से लोग सोना, चाँदी, नया बर्तन या झाड़ू ख़रीदते हैं, यह मानकर कि इससे आने वाला साल शुभ रहता है।

भारत भर में दिवाली

अयोध्या में दीपोत्सव के दौरान सरयू नदी के किनारे लाखों दीये जलाए जाते हैं। वाराणसी लगभग दो हफ़्ते बाद कार्तिक पूर्णिमा पर देव दीपावली के लिए अपने घाटों को रोशन करता है। तमिलनाडु और कर्नाटक में दीपावली की सुबह भोर से पहले तेल स्नान और नए कपड़ों से शुरू होती है। महाराष्ट्र में लक्ष्मी पूजा का अगला दिन पाडवा है, जो पति-पत्नी को समर्पित है, और बच्चे मिट्टी के छोटे-छोटे किले बनाते हैं।

उत्तराखंड के कुमाऊँ में महिलाएँ ऐपण बनाती हैं, जो लाल और सफ़ेद रंग की पारंपरिक भूमि कला है, और मुख्य दरवाज़े से पूजा घर तक लक्ष्मी के छोटे पदचिह्न बनाती हैं, ताकि देवी को घर का रास्ता मिले। कुछ घरों में गन्ने के डंठलों से लक्ष्मी भी बनाई जाती हैं। गढ़वाल में कई गाँव ग्यारह दिन बाद एकादशी को इगास-बग्वाल भी मनाते हैं, जबकि देहरादून के पास जौनसार-बावर क्षेत्र मुख्य त्योहार के लगभग एक महीने बाद अपनी बूढ़ी दिवाली मनाता है। लोक मान्यता है कि राम के लौटने की ख़बर पहाड़ों तक देर से पहुँची, जबकि एक और कथा इसे तिब्बत के अभियान से गढ़वाली सेनापति माधो सिंह भंडारी की वापसी से जोड़ती है। इगास की रात लोग चीड़ की लकड़ी की जलती मशालें, जिन्हें भैलो कहते हैं, घुमाते हैं और गाँव के आँगनों में नाचते हैं। देहरादून में दिवाली से पहले के दिनों में पलटन बाज़ार और राजपुर रोड जैसे बाज़ार ख़रीदारों से भर जाते हैं।

दिवाली पर दफ़्तर, बैंक, बाज़ार और यात्रा

दिवाली पूरे भारत में राजपत्रित अवकाश है, और बैंक, दफ़्तर और स्कूल बंद रहते हैं; 2026 में यह रविवार को है। कई राज्य गोवर्धन पूजा या भाई दूज की छुट्टी भी देते हैं, और उत्तराखंड ने पिछले कुछ वर्षों में इगास-बग्वाल पर भी छुट्टी घोषित की है।

दिवाली पूरे भारत में सार्वजनिक अवकाश है। केंद्र सरकार इसे अपने दफ़्तरों की 14 अनिवार्य छुट्टियों में रखती है, और हर राज्य भी अपने दफ़्तर बंद रखता है। 2026 में मुख्य दिन रविवार, 8 नवंबर को है, इसलिए ज़्यादातर दफ़्तरों को कामकाजी दिन की छुट्टी नहीं मिलती, लेकिन कई राज्यों और बैंकों में आसपास के दिनों में छुट्टी रहती है। उत्तराखंड में राज्य सरकार के दफ़्तर और देहरादून में बैंक मंगलवार, 10 नवंबर को गोवर्धन पूजा के लिए बंद रहते हैं। उत्तर प्रदेश में राज्य के दफ़्तर 9 और 11 नवंबर को भी बंद रहते हैं, और लखनऊ व कानपुर में बैंक सोमवार, 9 नवंबर और बुधवार, 11 नवंबर को बंद रहते हैं। हर राज्य के बैंक, केंद्र सरकार और राज्य सरकार के अवकाश पेजों पर सभी छुट्टियों की सूची है।

स्टॉक एक्सचेंज दिवाली को ट्रेडिंग अवकाश रखते हैं, लेकिन शाम को मुहूर्त ट्रेडिंग नाम का एक छोटा विशेष सत्र होता है, जिसका समय एक्सचेंज कुछ हफ़्ते पहले घोषित करते हैं। बलिप्रतिपदा, मंगलवार, 10 नवंबर 2026 को फिर से ट्रेडिंग बंद रहती है।

ट्रेनें और बसें सामान्य रूप से चलती हैं, लेकिन लंबी दूरी की ट्रेनें हफ़्तों पहले भर जाती हैं और त्योहार से पहले के दिनों में बड़े शहरों से बाहर जाने वाली सड़कों पर भीड़ रहती है। बाज़ार देर तक खुले रहते हैं, धनतेरस पर सबसे ज़्यादा भीड़ होती है और दिवाली की शाम जल्दी बंद हो जाते हैं। अस्पताल और आपातकालीन सेवाएँ सामान्य रूप से काम करती हैं।

अन्य नाम और संबंधित त्योहार

  • दीपावली
  • रोशनी का त्योहार
  • लक्ष्मी पूजा
  • दीपावली (तमिलनाडु में)

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

2026 में दिवाली कब है?

दिवाली रविवार, 8 नवंबर 2026 को है।

क्या दिवाली पर बैंक बंद रहते हैं?

2026 में दिवाली पर कर्नाटक में बैंक बंद रहते हैं; हर क्षेत्र अपनी RBI अवकाश सूची मानता है। बाकी जगह इस दिन रविवार है, जब बैंक वैसे भी बंद रहते हैं। अपना राज्य नीचे चुनकर देखें।

दिवाली पर किन राज्यों में सरकारी दफ़्तर बंद रहते हैं?

2026 में दिवाली पर उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, बिहार, असम, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल, राजस्थान, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़, गोवा और जम्मू और कश्मीर में राज्य सरकार के दफ़्तर बंद रहते हैं। पूरी अवकाश सूची के लिए नीचे अपना राज्य चुनें।

दिवाली किन राज्यों में प्रतिबंधित अवकाश है?

2026 में गुजरात में दिवाली राज्य सरकार के कर्मचारियों के लिए प्रतिबंधित (वैकल्पिक) अवकाश है: कर्मचारी छुट्टी ले सकते हैं, पर दफ़्तर खुले रहते हैं।

क्या दिवाली केंद्र सरकार की छुट्टी है?

हाँ। दिवाली 2026 में केंद्र सरकार के सभी दफ़्तरों की अनिवार्य छुट्टियों में से एक है।

क्या दिवाली पर शेयर बाज़ार बंद रहता है?

दिवाली के दिन रविवार है, जब बाज़ार वैसे भी बंद रहते हैं।

दिवाली के अन्य नाम क्या हैं?

दिवाली को दीपावली, रोशनी का त्योहार और लक्ष्मी पूजा भी कहा जाता है।

दिवाली क्यों मनाते हैं?

हिंदू देवी लक्ष्मी के स्वागत के लिए और रावण पर विजय के बाद भगवान राम के अयोध्या लौटने की याद में दिवाली मनाते हैं। जैन और सिख भी अपने-अपने ऐतिहासिक कारणों से यह दिन मनाते हैं।

इगास-बग्वाल क्या है?

यह उत्तराखंड के गढ़वाल में मुख्य त्योहार के ग्यारह दिन बाद एकादशी को मनाई जाने वाली दिवाली है। लोग चीड़ की लकड़ी की भैलो मशालें जलाते हैं और गाँव के आँगनों में नाचते हैं।

दिवाली पर किन देवी-देवताओं की पूजा होती है?

दिवाली की रात देवी लक्ष्मी और भगवान गणेश की एक साथ पूजा होती है। बंगाल, ओडिशा और असम में इसी रात देवी काली की पूजा होती है।

कम प्रदूषण वाली दिवाली कैसे मनाएँ?

मिट्टी के दीये जलाएँ, पटाखे न चलाएँ या कम चलाएँ, जहाँ अनुमति हो वहाँ ग्रीन पटाखे चुनें, और प्लास्टिक की चीज़ों की जगह मिठाई या पौधे उपहार में दें।

दिवाली 2026 पर लक्ष्मी पूजा का मुहूर्त क्या है?

नई दिल्ली में रविवार, 8 नवंबर 2026 को लक्ष्मी पूजा का प्रदोष काल मुहूर्त शाम 5:48 से शाम 7:14 तक है, लगभग 1 घंटा 26 मिनट। दूसरे शहरों में समय थोड़ा अलग होता है।

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