हिंदू · कर्नाटक
उगादि 2027 Ugadi
तेलुगु और कन्नड़ नववर्ष
बुधवार, 7 अप्रैल 2027
चंद्र पंचांग: 7 अप्रैल 2027
प्रतिपदा (1), शुक्ल पक्ष
माह: चैत्र (पूर्णिमांत, उत्तर भारत)
विक्रम संवत 2084 · शक संवत 1949
उगादि चैत्र की अमावस्या के अगले दिन आता है, जो कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में माने जाने वाले अमांत वर्ष का पहला दिन है, इसलिए विक्रम और शक दोनों वर्ष इसी तारीख़ को बदलते हैं।
उगादि आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक का चंद्र नववर्ष है। इस दिन तेल स्नान होता है, आम के पत्तों का तोरण बाँधा जाता है, छह स्वाद वाली उगादि पचड़ी खाई जाती है और नया पंचांग पढ़ा जाता है।
तारीख कैसे तय होती है: चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, यानी चंद्र-सौर पंचांग में चैत्र माह के शुक्ल पक्ष का पहला दिन

उगादि: दिन-ब-दिन 2027
| दिन | 2027 | क्या होता है |
|---|---|---|
| चैत्र अमावस्या (उगादि की पूर्व संध्या) | मंगल, 6 अप्रैल | अमावस्या का दिन; घरों की सफ़ाई होती है और आम के पत्ते, नीम के फूल ख़रीदे जाते हैं। |
| उगादि (युगादि) | बुध, 7 अप्रैल | तेल स्नान, आम के पत्तों का तोरण, उगादि पचड़ी और पंचांग श्रवणम। |
उगादि उस दिन मनाया जाता है जब सूर्योदय के समय प्रतिपदा तिथि चल रही हो, और 2027 में यह बुधवार, 7 अप्रैल है।
उगादि क्यों मनाते हैं
उगादि चंद्र पंचांग मानने वाले तेलुगु और कन्नड़ भाषी परिवारों के लिए नए साल का दिन है। यह शब्द संस्कृत के दो शब्दों से बना है, युग यानी काल और आदि यानी आरंभ, इसलिए इस नाम का अर्थ ही है एक नए युग की शुरुआत। यह चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को मनाया जाता है, जो चैत्र की अमावस्या के बाद का पहला चंद्र दिवस है, जब पूरे दक्कन में वसंत पूरे रंग पर होता है। 2027 में यह दिन बुधवार, 7 अप्रैल को है।
यह त्योहार नई और साफ़ शुरुआत का है। घरों की अच्छी तरह सफ़ाई होती है, पुराने झगड़े भुला दिए जाते हैं, और व्यापारी छोटी सी पूजा के बाद नए बही-खाते खोलते हैं। किसान बुआई के मौसम की तैयारी करते हैं, और छात्र व युवा कामकाजी लोग अक्सर इसी सुबह कुछ नया शुरू करते हैं, क्योंकि पूरा दिन शुभ माना जाता है।
उगादि अपने भोजन के ज़रिए एक गहरी सीख भी देता है। इस दिन सबसे पहले छह स्वादों का मिश्रण खाया जाता है, और बड़े-बुज़ुर्ग समझाते हैं कि आने वाला साल हर एक का थोड़ा-थोड़ा हिस्सा लाएगा: ख़ुशी, दुख, क्रोध, भय, आश्चर्य और घृणा। इन सबको शांत मन से स्वीकार करना ही इस दिन की असली कामना है।
तेलुगु और कन्नड़ पंचांग के साठ वर्षों के चक्र में हर वर्ष का अपना नाम होता है। उगादि 2026 पर शुरू हुआ वर्ष पराभव है, और 7 अप्रैल 2027 से शुरू होने वाला वर्ष प्लवंग है।
उगादि का इतिहास और कथा
हिंदू परंपरा के अनुसार सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा ने चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के सूर्योदय पर ब्रह्मांड की रचना शुरू की थी। समय, ग्रह, ऋतुएँ और सभी जीव उसी पहली सुबह से अस्तित्व में आए, इसलिए इस दिन को सृष्टि का जन्मदिन माना जाता है। आंध्र प्रदेश और कर्नाटक के कई मंदिरों में उगादि पर ब्रह्मा की विशेष पूजा होती है, जो साल के उन गिने-चुने अवसरों में से है जब उनकी सीधे आराधना होती है।
खगोल विज्ञान ने इस मान्यता को ठोस रूप दिया। दक्कन के भारतीय खगोलशास्त्री वर्ष, माह और दिन की गणना इसी तारीख़ के सूर्योदय से शुरू करते थे। बारहवीं सदी के गणितज्ञ भास्कराचार्य, जिनकी रचनाएँ पूरे दक्षिण भारत में पढ़ी जाती थीं, अपनी सारणियों में इसी दिन को वर्ष का आरंभ मानते थे।
शक संवत, जो भारत के राष्ट्रीय पंचांग का भी आधार है, कई विद्वानों के अनुसार दक्कन के शालिवाहन राजाओं के शासन से जुड़ा है, और कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में चंद्र शक वर्ष इसी दिन शुरू होता है। दक्कन के राजदरबार नए साल पर पूजा करते थे और मंदिरों व विद्वानों को दान देते थे। सदियों के साथ नए पंचांग का पाठ एक सार्वजनिक आयोजन बन गया, जो मंदिरों और राजदरबारों में होता था, ताकि किसान और व्यापारी पूरे साल की योजना बना सकें।
उगादि कैसे मनाते हैं
तैयारी लगभग एक हफ़्ते पहले शुरू हो जाती है। परिवार घर में सफ़ेदी करवाते हैं या उसे धोते हैं, पुरानी चीज़ें निकालते हैं और नए कपड़े ख़रीदते हैं। एक दिन पहले बाज़ार आम के पत्तों के गुच्छों, नीम के फूलों, कच्चे आमों और चमेली से भर जाते हैं।
उगादि की सुबह सूर्योदय से पहले अभ्यंग स्नानम, यानी तेल स्नान, से शुरू होती है। बड़े-बुज़ुर्ग छोटों के बालों और शरीर पर गुनगुना तिल का तेल लगाते हैं, फिर वे शिकाकाई या जड़ी-बूटियों के चूर्ण से नहाते हैं। सब नए कपड़े पहनते हैं। मुख्य दरवाज़े पर ताज़े आम के पत्तों का तोरण बाँधा जाता है, और दहलीज़ को धोकर उस पर हल्दी लगाई जाती है और कुमकुम व रंग-बिरंगे मुग्गु या रंगोली से सजाया जाता है।
इसके बाद परिवार कुलदेवता की पूजा करता है, और कई घरों में नए साल के लिए भगवान ब्रह्मा से प्रार्थना की जाती है। नया पंचांगम, यानी साल भर का पंचांग, देवता के सामने रखकर फूलों और फलों के साथ उसकी पूजा की जाती है।
पूजा के बाद साल का पहला स्वाद चखा जाता है। तेलुगु घरों में इसे उगादि पचड़ी कहते हैं, जबकि कर्नाटक में यह बेवु बेल्ला है, जिसका सीधा अर्थ है नीम और गुड़। किसी और भोजन से पहले हर सदस्य को इसका एक चम्मच दिया जाता है।
फिर त्योहार का दोपहर का भोजन होता है। तेलुगु रसोई में पुलिहोरा (इमली वाले चावल), बोब्बटलु (मीठी भरवाँ रोटी) और पायसम बनते हैं, जबकि कन्नड़ घरों में घी के साथ होलिगे या ओब्बट्टु, चित्रान्ना और कोसंबरी परोसे जाते हैं।
देर सुबह या शाम को लोग पंचांग श्रवणम के लिए किसी मंदिर या सामुदायिक भवन में जुटते हैं। पुजारी नए पंचांग से पढ़कर बताते हैं कि ग्रह-नक्षत्र बारिश, फ़सल, क़ीमतों और हर राशि के भाग्य के बारे में क्या संकेत देते हैं। कई शहरों में तेलुगु और कन्नड़ में कवि सम्मेलन भी होते हैं।
उगादि के प्रतीक, पकवान और रीति-रिवाज
आम के पत्तों का तोरण उगादि की पहचान है। मुख्य दरवाज़े पर टँगी ताज़े हरे पत्तों की लड़ी के बारे में माना जाता है कि वह सौभाग्य का स्वागत करती है और हवा को ताज़ा रखती है, और पड़ोसियों को बताती है कि इस घर ने नए साल में प्रवेश कर लिया है। इस समय आम के पेड़ों पर नए पत्ते और शुरुआती फल आते हैं, इसलिए वे स्वाभाविक रूप से विकास का प्रतीक हैं।
नीम दूसरा प्रतीक है। इसके छोटे सफ़ेद फूल चैत्र में खिलते हैं, और पचड़ी में उनका कड़वा स्वाद सबको याद दिलाता है कि कठिनाई भी जीवन का हिस्सा है। पारंपरिक वैद्य भी गर्मी के महीनों में मौसमी बीमारियों से बचाव के लिए नीम को उपयोगी मानते हैं।
उगादि पचड़ी इस त्योहार का केंद्र है। इसकी छह सामग्रियों में से हर एक का अपना अर्थ है: गुड़ ख़ुशी का, नीम के फूल दुख का, कच्चा आम आश्चर्य का, इमली घृणा का, हरी मिर्च या काली मिर्च क्रोध का, और नमक भय का। इन्हें साथ खाना संतुलन की सीख देता है।
छपा हुआ पंचांगम योजना और ज्ञान का प्रतीक है। परिवार हर उगादि पर इसकी नई प्रति ख़रीदते हैं।
दूसरे रिवाजों में नए कपड़े, तेल स्नान, दहलीज़ पर मुग्गु की आकृतियाँ और आशीर्वाद लेने के लिए बड़ों से मिलने जाना शामिल है। बोब्बटलु, होलिगे, पुलिहोरा और आम के व्यंजन जैसे त्योहारी पकवानों से थाली भर जाती है।
भारत भर में उगादि
आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में इस त्योहार को उगादि कहते हैं, और उगादि पचड़ी इस दिन का केंद्र है। कई परिवार श्रीशैलम या भद्राचलम मंदिर जाते हैं, और लेखकों व कलाकारों को राज्य सरकार के उगादि पुरस्कार देना एक पुरानी परंपरा है। कर्नाटक में इसे युगादि कहते हैं, और कई गाँवों में अगला दिन वर्षादोडकु के रूप में मनाया जाता है, जो मेल-मिलाप, खेलों और आराम से खाने-पीने का दिन है। उत्तर कर्नाटक के घरों में भुने चने और ताज़े गुड़ के साथ बेवु बेल्ला पसंद किया जाता है।
यही चंद्र तिथि कई दूसरी जगहों पर अलग-अलग नामों से नए साल की शुरुआत है। महाराष्ट्र और गोवा में गुड़ी पड़वा मनाया जाता है, सिंधी अगले दिन चेटी चंड मनाते हैं, कश्मीरी पंडित नवरेह मनाते हैं, और मणिपुर में साजिबु चेइराओबा मनाया जाता है।
उत्तराखंड समेत उत्तर भारत में इसी तिथि से चैत्र नवरात्रि शुरू होती है और नया विक्रम संवत वर्ष आरंभ होता है। देहरादून में परिवार नौ दिनों की दुर्गा पूजा के लिए कलश स्थापित करते हैं। देहरादून और दूसरे उत्तरी शहरों में रहने वाले तेलुगु और कन्नड़ परिवार अक्सर दक्षिण भारतीय मंदिरों या अपनी संस्थाओं के भवनों में मिलते हैं, साथ में पचड़ी बाँटते हैं और पंचांग का पाठ सुनते हैं।
उगादि पर दफ़्तर, बैंक, बाज़ार और यात्रा
केंद्र सरकार की सूची में उगादि प्रतिबंधित अवकाश है। कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में आमतौर पर इस दिन राज्य के दफ़्तर बंद रहते हैं, और महाराष्ट्र में यही दिन गुड़ी पड़वा के रूप में मनाया जाता है।
उगादि केंद्र सरकार के कर्मचारियों के लिए प्रतिबंधित अवकाश है, यानी हर कर्मचारी अपने सीमित वैकल्पिक दिनों में से एक के रूप में इसे ले सकता है। 2027 की केंद्र की सूची में यह बुधवार, 7 अप्रैल को है। एम्स ऋषिकेश ने भी 2027 के लिए इसे प्रतिबंधित अवकाश की सूची में रखा है। 2026 में दिल्ली सरकार, केंद्रीय विद्यालय संगठन, भारतीय सर्वेक्षण विभाग और देहरादून, लखनऊ और पटना के कई केंद्रीय दफ़्तरों ने इसे प्रतिबंधित अवकाश के रूप में रखा था।
उत्तर भारत के ज़्यादातर हिस्सों में केंद्र सरकार के दफ़्तर और राष्ट्रीयकृत बैंक प्रतिबंधित अवकाश पर खुले रहते हैं। कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में आमतौर पर उगादि पर राज्य के दफ़्तरों, स्कूलों और बैंकों में सामान्य अवकाश रहता है, लेकिन 2027 की राज्य और बैंक अवकाश सूचियाँ अभी जारी नहीं हुई हैं, इसलिए जारी होने पर उन्हें देख लें।
त्योहार से पहले के दिनों में बेंगलुरु, हैदराबाद, विजयवाड़ा और दूसरे दक्षिणी शहरों के बाज़ारों में बहुत भीड़ रहती है, और आम के पत्तों, नीम के फूलों, फूलों और नए कपड़ों की भारी माँग होती है। दूसरे शहरों में काम करने वाले बहुत से लोग घर जाते हैं, इसलिए त्योहार के आसपास आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक की ओर जाने वाली बसें और ट्रेनें भरी चलती हैं। त्योहार के दिन इन राज्यों में ज़्यादातर दुकानें देर से खुलती हैं या जल्दी बंद हो जाती हैं।
अन्य नाम और संबंधित त्योहार
- कन्नड़ नववर्ष
- तेलुगु नववर्ष
- उगादि हब्बा
- युगादि
- उगादि (आंध्र प्रदेश में)
- उगादि (तेलंगाना में)
चैत्र शुक्लादि / नव संवत्सर 7 अप्रैल 2027
गुड़ी पड़वा 7 अप्रैल 2027
चेटी चंड 7 अप्रैल 2027
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
2027 में उगादि कब है?
उगादि बुधवार, 7 अप्रैल 2027 को है।
क्या उगादि पर बैंक बंद रहते हैं?
2027 की RBI बैंक अवकाश सूचियाँ अभी जारी नहीं हुई हैं; ये आमतौर पर दिसंबर या जनवरी में आती हैं। हर राज्य की अपनी सूची होती है, इसलिए तब अपने राज्य का बैंक अवकाश पेज देखें।
क्या उगादि केंद्र सरकार की छुट्टी है?
उगादि वैकल्पिक छुट्टियों की सूची में है। हर राज्य की राजधानी में केंद्र सरकार कर्मचारी समन्वय समिति तय करती है कि उस राज्य में दफ़्तर इस दिन बंद रहेंगे या नहीं।
उगादि के अन्य नाम क्या हैं?
उगादि को कन्नड़ नववर्ष, तेलुगु नववर्ष, उगादि हब्बा, युगादि और उगादि भी कहा जाता है।
उगादि शब्द का क्या अर्थ है?
यह संस्कृत के शब्द युग (काल) और आदि (आरंभ) से बना है। दोनों मिलकर नए युग या नए साल की शुरुआत का अर्थ देते हैं।
उगादि पचड़ी किससे बनती है?
इसमें नीम के फूल, गुड़, कच्चा आम, इमली, मिर्च या काली मिर्च, और नमक मिलाए जाते हैं। ये छह स्वाद आने वाले साल में जीवन के मिले-जुले अनुभवों के प्रतीक हैं।
क्या उगादि और गुड़ी पड़वा एक ही हैं?
दोनों चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को चंद्र नववर्ष मनाते हैं। कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में इसे उगादि कहते हैं, जबकि गुड़ी पड़वा महाराष्ट्र और गोवा का उत्सव है।
उगादि पर वर्ष को नाम क्यों दिया जाता है?
तेलुगु और कन्नड़ पंचांग वर्षों को साठ के चक्र में गिनते हैं, और हर वर्ष का एक तय नाम होता है। हर उगादि पर चक्र एक क़दम आगे बढ़ता है, इसलिए 2026 में पराभव शुरू हुआ और 2027 में प्लवंग शुरू होता है।
अगले 30 दिनों के हिंदू त्योहार
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17 अक्टूशनि
दुर्गा पूजा
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18 अक्टूरवि
दुर्गा पूजा (महा सप्तमी)
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19 अक्टूसोम
दुर्गा अष्टमी (महाअष्टमी)
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20 अक्टूमंगल
दशहरा
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20 अक्टूमंगल
महा नवमी
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25 अक्टूरवि
शरद पूर्णिमा
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26 अक्टूसोम
महर्षि वाल्मीकि जयंती
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29 अक्टूगुरु
करवा चौथ
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6 नवंशुक्र
धनतेरस
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8 नवंरवि
दिवाली
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8 नवंरवि
नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली)
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8 नवंरवि
लक्ष्मी पूजा
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