हिंदू
होलिका दहन 2027 Holika Dahan
होली से पहले की रात का अलाव
सोमवार, 22 मार्च 2027
होलिका दहन होली की पूर्व संध्या पर जलाई जाने वाली होली है। यह याद दिलाती है कि कैसे भक्त प्रह्लाद आग से बच निकले और उनकी बुआ होलिका जल गई, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है।
तारीख कैसे तय होती है: हिंदू माह फाल्गुन की पूर्णिमा, सूर्यास्त के बाद और भद्रा काल के बाहर जलाई जाती है; रंगों वाली होली अगले दिन होती है
होलिका दहन क्यों मनाते हैं
होलिका दहन होली जलाने की वह रात है जिससे होली का त्योहार शुरू होता है। फाल्गुन की पूर्णिमा पर लोग लकड़ी और गोबर के उपलों के ढेर के चारों ओर जुटते हैं, छोटी सी पूजा करते हैं और उसमें आग लगाते हैं। यह आग बुराई, अहंकार और नकारात्मकता के जलकर ख़त्म होने का प्रतीक है। अगली सुबह लोग रंग खेलते हैं।
यह त्योहार खेती के साल में एक बदलाव का भी संकेत है। उत्तर भारत के खेतों में गेहूँ, जौ और चने की रबी फ़सल पक रही होती है। किसान नए अनाज की पहली बालियाँ होलिका की आग में भूनते हैं और फ़सल के लिए धन्यवाद देते हुए उन्हें प्रसाद के रूप में बाँटते हैं। मोहल्लों के लिए मिलकर होली सजाना होली के रंग खेलने से पहले लोगों को और क़रीब लाने का एक तरीक़ा भी है।
होलिका दहन का इतिहास और कथा
सबसे प्रसिद्ध कथा पुराणों से आती है। असुर राजा हिरण्यकशिपु ने ऐसा वरदान पा लिया था जिससे उसे मारना लगभग असंभव था। अपनी ताक़त के घमंड में उसने सबको अपनी पूजा करने का आदेश दिया। उसके अपने बेटे प्रह्लाद ने मना कर दिया और भगवान विष्णु की प्रार्थना करता रहा। ग़ुस्साए राजा ने बालक को मारने के कई तरीक़े अपनाए, लेकिन हर कोशिश नाकाम रही।
आख़िर में उसने अपनी बहन होलिका का सहारा लिया, जिसे परंपरा के अनुसार आग नुक़सान नहीं पहुँचा सकती थी। वह प्रह्लाद को गोद में लेकर जलती चिता पर बैठ गई। भक्तों का विश्वास है कि प्रह्लाद की आस्था ने उनकी रक्षा की, जबकि होलिका जलकर राख हो गई। इसके कुछ समय बाद विष्णु नरसिंह रूप में प्रकट हुए, जो आधे मनुष्य और आधे सिंह थे, और उन्होंने हिरण्यकशिपु का वध किया। होली की आग होलिका के अंत और प्रह्लाद की अटूट आस्था की याद दिलाती है।
दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में यही रात एक अलग कथा की याद दिलाती है, जिसमें शिव ने अपने तीसरे नेत्र की अग्नि से प्रेम के देवता कामदेव को भस्म कर दिया था। वहाँ इस त्योहार को काम दहनम कहते हैं।
होलिका दहन कैसे मनाते हैं
त्योहार से कई दिन पहले लोग किसी चौराहे या खुले मैदान में लकड़ी, सूखे पत्ते और गोबर के उपले इकट्ठा करते हैं। उत्तर भारत के कई घरों में महिलाएँ गोबर की छोटी-छोटी गोलियों की मालाएँ बनाती हैं, जिन्हें बड़कुल्ले या गुलरिया कहते हैं, और उन्हें होली में डालती हैं।
पूर्णिमा की शाम महिलाएँ और परिवार होलिका पूजा करते हैं। वे जल, रोली, चावल, फूल, हल्दी, गुड़, नारियल और गेहूँ या जौ की ताज़ा बालियाँ अर्पित करते हैं। होली की परिक्रमा करते हुए उसके चारों ओर तीन या सात बार कच्चा सूत लपेटा जाता है। सूर्यास्त के बाद, स्थानीय पंचांग में तय समय पर, कोई बुज़ुर्ग आग जलाता है। लोग उसकी परिक्रमा करते हैं, परिवार की सेहत के लिए प्रार्थना करते हैं और लपटों में अनाज भूनते हैं। बहुत से लोग थोड़ी राख या अंगारे घर ले जाते हैं, जिसे कुछ लोग अगली सुबह तिलक के रूप में लगाते हैं।
परिवार भद्रा काल में आग जलाने से बचते हैं, क्योंकि इस समय को अशुभ माना जाता है। 2026 में 3 मार्च की शाम चंद्र ग्रहण है, इसलिए कुछ क्षेत्रीय पंचांग होलिका दहन 2 मार्च की रात बताते हैं। रंग 4 मार्च को खेला जाएगा।
महत्वपूर्ण दिन और पल
- लकड़ी इकट्ठा करना और होली सजाना (पूर्णिमा से कुछ दिन पहले)
मोहल्ले के लोग एक साझा जगह पर लकड़ी, उपले और सूखे पत्ते इकट्ठा करते हैं, और अक्सर ढेर के बीच में एक डंडा गाड़ते हैं। - होलिका पूजा (शाम, 3 मार्च 2026 (मंगलवार))
महिलाएँ और परिवार रोली, चावल, फूल, नारियल और नया अनाज अर्पित करते हैं और होली के चारों ओर कच्चा सूत लपेटते हैं। - होली जलाना (सूर्यास्त के बाद, भद्रा काल के बाहर)
कोई बुज़ुर्ग आग जलाता है। लोग उसकी परिक्रमा करते हैं, प्रार्थना करते हैं और लपटों में गेहूँ या जौ की बालियाँ भूनते हैं। ग्रहण के कारण 2026 में कुछ पंचांग 2 मार्च को बेहतर मानते हैं। - धुलंडी, रंगों का दिन (4 मार्च 2026 (बुधवार))
होली जलने के अगले दिन सुबह लोग गुलाल और रंगीन पानी से खेलते हैं, दोस्तों से मिलने जाते हैं और गुझिया और ठंडाई बाँटते हैं।
भारत भर में होलिका दहन
ब्रज क्षेत्र में मथुरा के पास फालेन गाँव एक पुजारी के लिए जाना जाता है जो होलिका की आग में से होकर गुज़रता है, जिसे भक्त प्रह्लाद की रक्षा का संकेत मानते हैं। पश्चिम बंगाल और ओडिशा में पूर्णिमा को दोल पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है, और उससे पहले की शाम होली जलाई जाती है।
उत्तराखंड की कुमाऊँ की पहाड़ियों में होली का अपना अलग अंदाज़ है। आमलकी एकादशी पर चीर नाम का एक डंडा गाड़ा जाता है और उस पर कपड़े की पट्टियाँ लपेटी जाती हैं, और पूर्णिमा की रात इसे स्थानीय होलिका के रूप में जलाया जाता है। लोग आशीर्वाद के रूप में कपड़े के टुकड़े घर ले जाते हैं। देहरादून और गढ़वाल के शहरों में उत्तर भारत की आम होली जलाने की परंपरा निभाई जाती है।
होली उत्सव के दिन (2027)
होलिका दहन: सोमवार, 22 मार्च 2027
होली (मुख्य दिन)
अन्य नाम और संबंधित त्योहार
- छोटी होली
- होलिका दहन
- कामुडु दहन
होली 23 मार्च 2027
दोल यात्रा 22 मार्च 2027
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
2027 में होलिका दहन कब है?
होलिका दहन सोमवार, 22 मार्च 2027 को है।
क्या होलिका दहन पर बैंक बंद रहते हैं?
2027 की RBI बैंक अवकाश सूचियाँ अभी जारी नहीं हुई हैं; ये आमतौर पर दिसंबर या जनवरी में आती हैं। हर राज्य की अपनी सूची होती है, इसलिए तब अपने राज्य का बैंक अवकाश पेज देखें।
क्या होलिका दहन केंद्र सरकार की छुट्टी है?
होलिका दहन प्रतिबंधित अवकाश है। केंद्र सरकार के कर्मचारी इसे साल के अपने दो प्रतिबंधित अवकाशों में से एक के रूप में ले सकते हैं।
होलिका दहन के अन्य नाम क्या हैं?
होलिका दहन को छोटी होली, होलिका दहन और कामुडु दहन भी कहा जाता है।
होलिका दहन क्यों मनाया जाता है?
यह प्रह्लाद की कथा की याद दिलाता है, जो विष्णु में अपनी आस्था के बल पर आग से बच गए, जबकि उनकी बुआ होलिका जल गई। होली की आग बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है।
होलिका की आग में क्या अर्पित किया जाता है?
लोग नारियल, चावल, रोली, फूल, गुड़ और गेहूँ या जौ की ताज़ा बालियाँ अर्पित करते हैं। होली जलाने से पहले उसके चारों ओर कच्चा सूत लपेटा जाता है।
क्या होलिका दहन और छोटी होली एक ही हैं?
हाँ, उत्तर भारत में होली जलने वाले दिन को अक्सर छोटी होली कहते हैं। रंगों वाली मुख्य होली, जिसे धुलंडी भी कहते हैं, अगले दिन होती है।
अगले 30 दिनों के हिंदू त्योहार
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17 अक्टूशनि
दुर्गा पूजा
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18 अक्टूरवि
दुर्गा पूजा (महा सप्तमी)
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19 अक्टूसोम
दुर्गा अष्टमी (महाअष्टमी)
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20 अक्टूमंगल
दशहरा
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20 अक्टूमंगल
महा नवमी
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25 अक्टूरवि
शरद पूर्णिमा
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26 अक्टूसोम
महर्षि वाल्मीकि जयंती
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29 अक्टूगुरु
करवा चौथ
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6 नवंशुक्र
धनतेरस
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8 नवंरवि
दिवाली
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8 नवंरवि
नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली)
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8 नवंरवि
लक्ष्मी पूजा
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9 नवंसोम
गोवर्धन पूजा
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11 नवंबुध
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शुक्रवार, 2 अक्टूबर गांधी जयंती 2 अक्टूबर को गांधी जयंती भारत के स्वतंत्रता संग्राम के नेता और सत्य व अहिंसा की आवाज़ महात्मा गांधी की जयंती है। |
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दुर्गा पूजा
- मंगल, 20 अक्टू
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- रवि, 8 नवं
दिवाली
- रवि, 15 नवं
छठ पूजा
- मंगल, 24 नवं
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