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निशान साहिबगुरु नानक जयंती 2026 Guru Nanak Jayanti

गुरु नानक देव जी का प्रकाश पर्व

मंगलवार, 24 नवंबर 2026

2027 में: रविवार, 14 नवंबर 2027

गुरु नानक जयंती, जिसे प्रकाश पर्व भी कहते हैं, सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव जी के जन्म का उत्सव है। इस दिन अरदास, नगर कीर्तन, लंगर होते हैं और गुरुद्वारे रोशनी से जगमगाते हैं।

तारीख कैसे तय होती है: कार्तिक पूर्णिमा (हिंदू माह कार्तिक की पूर्णिमा)

पूर्णिमा के चाँद के नीचे रोशनी की लड़ियों और दीयों से जगमगाता एक सफ़ेद गुरुद्वारा, पास में केसरिया निशान साहिब, और सिर ढके श्रद्धालु प्रभात फेरी में गुज़रते हुए।
गुरपुरब की रात: प्रभात फेरी के गुज़रते समय रोशनी से जगमगाता गुरुद्वारा ICC Holidays, मौलिक चित्र, अपना काम, श्रेय के साथ दोबारा उपयोग के लिए मुक्त

गुरु नानक जयंती क्यों मनाते हैं

गुरु नानक जयंती सिखों का सबसे महत्वपूर्ण गुरपुरब है। यह दस सिख गुरुओं में पहले और सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव जी के जन्म का दिन है। सिख इस दिन को प्रकाश पर्व यानी रोशनी का त्योहार कहते हैं, क्योंकि उनका मानना है कि गुरु जी के जन्म ने भेदभाव और अंधविश्वास भरे कर्मकांड से परेशान दुनिया में आध्यात्मिक प्रकाश फैलाया। 2026 में सिख गुरु नानक का 557वाँ प्रकाश पर्व मना रहे हैं।

गुरु नानक ने सिखाया कि ईश्वर एक है, वही सबका रचयिता है और हर जीव में बसता है। उन्होंने अपनी वाणी की शुरुआत इक ओंकार शब्दों से की, जिसका अर्थ है ईश्वर एक है। उन्होंने जाति, धर्म या लिंग के आधार पर भेदभाव को नकारा और कहा कि सच्चा और ईमानदार जीवन कर्मकांडों से ज़्यादा मायने रखता है।

उनकी शिक्षाएँ तीन सरल नियमों पर टिकी हैं, जिन्हें सिख आज भी मानते हैं: नाम जपना, यानी ईश्वर का नाम स्मरण करना; किरत करनी, यानी ईमानदारी की मेहनत से रोज़ी कमाना; और वंड छकना, यानी जो कुछ है उसे दूसरों के साथ बाँटना। मुफ़्त सामुदायिक रसोई, लंगर, जहाँ सब एक साथ ज़मीन पर बैठकर एक जैसा भोजन करते हैं, इन्हीं शिक्षाओं से निकली। सिखों और बहुत से दूसरे लोगों के लिए यह दिन विनम्रता, ईमानदारी और सेवा के साथ जीने की याद दिलाता है।

गुरु नानक जयंती का इतिहास और कथा

गुरु नानक का जन्म 1469 में लाहौर के पास राय भोई दी तलवंडी गाँव में हुआ था, जिसे अब ननकाना साहिब कहते हैं और जो पाकिस्तान में है। उनके पिता मेहता कालू गाँव के पटवारी थे और माता का नाम माता तृप्ता था। उनकी बड़ी बहन बेबे नानकी उन पहले लोगों में थीं जिन्होंने उनके आध्यात्मिक स्वभाव को पहचाना। कुछ पुराने विवरण उनका जन्म वैसाख महीने में बताते हैं, लेकिन सिख समुदाय लंबे समय से इसे कार्तिक पूर्णिमा को मनाता आया है।

बचपन में नानक ऐसे सवाल पूछते थे जिनसे उनके शिक्षक और बड़े-बुज़ुर्ग हैरान रह जाते थे। युवावस्था में वे सुल्तानपुर लोधी चले गए, जहाँ उनकी बहन रहती थीं, और वहाँ भंडारी का काम करने लगे। सिख परंपरा के अनुसार एक सुबह वे काली बेईं नदी में नहाने गए और तीन दिन तक नहीं लौटे। लौटने पर उनके पहले शब्द थे कि न कोई हिंदू है, न कोई मुसलमान, यानी ईश्वर के सामने सब इंसान बराबर हैं।

अगले दो दशकों में गुरु नानक ने अपने साथी भाई मरदाना के साथ लंबी यात्राएँ कीं, जिन्हें उदासियाँ कहा जाता है। भाई मरदाना रबाब बजाते थे और गुरु जी गाते थे। परंपरा के अनुसार उन्होंने पूरे भारत के साथ श्रीलंका, तिब्बत, मक्का और बग़दाद तक यात्रा की और हिंदू साधुओं, मुस्लिम संतों और आम लोगों से संवाद किया। उन्होंने अपनी शिक्षाओं को सरल भाषा में भजनों के रूप में रचा, जिन्हें आम लोग समझ सकें।

अपने अंतिम वर्षों में गुरु नानक रावी नदी के किनारे करतारपुर में बस गए, जो अब पाकिस्तान में है। वहाँ उन्होंने अपने हाथों से खेती की और प्रार्थना, मेहनत और बाँटने पर आधारित एक समुदाय बनाया। 1539 में देह त्यागने से पहले उन्होंने अपने शिष्य भाई लहणा को अपना उत्तराधिकारी बनाया, जो गुरु अंगद देव कहलाए। जपजी साहिब समेत गुरु नानक की वाणी गुरु ग्रंथ साहिब का एक अहम हिस्सा है।

गुरु नानक जयंती कैसे मनाते हैं

उत्सव हफ़्तों पहले प्रभात फेरियों से शुरू हो जाता है, यानी सुबह-सुबह के जुलूस, जिनमें लोगों के समूह शबद गाते हुए मोहल्लों से गुज़रते हैं। गुरपुरब से दो दिन पहले गुरुद्वारों में अखंड पाठ शुरू होता है, यानी गुरु ग्रंथ साहिब का 48 घंटे का लगातार पाठ, जो त्योहार की सुबह पूरा होता है।

गुरपुरब से एक दिन पहले शहर में नगर कीर्तन निकलता है। पंज प्यारों के रूप में पाँच सिख निशान साहिब, यानी सिख ध्वज, लेकर जुलूस की अगुवाई करते हैं। गुरु ग्रंथ साहिब को सजी हुई पालकी में ले जाया जाता है। जत्थे शबद गाते हैं, बैंड बजते हैं, और गतका दल सिख युद्ध कला का प्रदर्शन करते हैं। रास्ते में लोग सड़क साफ़ करते हैं और पानी व जलपान की सेवा करते हैं।

गुरपुरब के दिन की शुरुआत अमृत वेला, यानी भोर से पहले के समय, में आसा दी वार के गायन से होती है। दिन भर कीर्तन, गुरु जी के जीवन पर कथा और उनकी वाणी का पाठ चलता है। गेहूँ के आटे, घी और चीनी से बना मीठा कड़ाह प्रसाद सबको दिया जाता है। हर धर्म के हज़ारों लोगों को लंगर परोसा जाता है, और सेवादार सेवा के रूप में खाना बनाते, परोसते और सफ़ाई करते हैं।

शाम को गुरुद्वारों और सिख घरों को दीयों, मोमबत्तियों और रोशनी से सजाया जाता है। परिवार गुरुद्वारे जाते हैं, और कुछ लोग आतिशबाज़ी भी करते हैं। इस दिन बहुत से लोग रक्तदान शिविरों और दान-पुण्य के कामों में भी हिस्सा लेते हैं।

महत्वपूर्ण दिन और पल

  1. प्रभात फेरियाँ (गुरपुरब से कई हफ़्ते पहले)
    सुबह-सुबह जत्थे शबद गाते हुए मोहल्लों से गुज़रते हैं, जिससे मुख्य उत्सव का माहौल बनता है।
  2. अखंड पाठ की शुरुआत (दो दिन पहले, 22 नवंबर 2026)
    गुरुद्वारों में गुरु ग्रंथ साहिब का 48 घंटे का लगातार पाठ शुरू होता है, जो गुरपुरब की सुबह पूरा होता है।
  3. नगर कीर्तन (एक दिन पहले, 23 नवंबर 2026)
    पंज प्यारों की अगुवाई में निशान साहिब और पालकी में गुरु ग्रंथ साहिब के साथ जुलूस कीर्तन और गतका करते हुए शहर से गुज़रता है।
  4. प्रकाश पर्व (24 नवंबर 2026 (मंगलवार))
    भोर में आसा दी वार, कीर्तन, कथा, कड़ाह प्रसाद और सबके लिए लंगर, फिर शाम को गुरुद्वारों और घरों में रोशनी।

भारत भर में गुरु नानक जयंती

अमृतसर के स्वर्ण मंदिर और दिल्ली के बंगला साहिब व शीशगंज साहिब जैसे गुरुद्वारों में भारी भीड़ उमड़ती है। सुल्तानपुर लोधी के गुरुद्वारा बेर साहिब में बड़े आयोजन होते हैं। भारतीय तीर्थयात्रियों के जत्थे पाकिस्तान में ननकाना साहिब जाते हैं, और 2019 से करतारपुर कॉरिडोर के ज़रिए गुरुद्वारा दरबार साहिब करतारपुर के दर्शन संभव हुए हैं।

उत्तराखंड का भी गुरु नानक से अपना जुड़ाव है। सिख परंपरा के अनुसार ऊधम सिंह नगर ज़िले का गुरुद्वारा नानकमत्ता साहिब और चंपावत ज़िले का गुरुद्वारा रीठा साहिब उन जगहों पर हैं जहाँ गुरु जी गए थे, और दोनों जगह गुरपुरब पर बड़ी संगत जुटती है। देहरादून में सिख समुदाय शहर में नगर कीर्तन निकालता है और गुरुद्वारे सबको लंगर परोसते हैं। यही पूर्णिमा कार्तिक पूर्णिमा भी है, जब बहुत से हिंदू हरिद्वार में गंगा स्नान करते हैं।

अन्य नाम और संबंधित त्योहार

  • गुरपुरब
  • गुरु नानक गुरपुरब
  • प्रकाश पर्व
  • प्रकाश पुरब
  • प्रकाश उत्सव

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

2026 में गुरु नानक जयंती कब है?

गुरु नानक जयंती मंगलवार, 24 नवंबर 2026 को है।

क्या गुरु नानक जयंती पर बैंक बंद रहते हैं?

2026 में गुरु नानक जयंती पर उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश, तेलंगाना, ओडिशा, झारखंड, हिमाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़ और जम्मू और कश्मीर में बैंक बंद रहते हैं; हर क्षेत्र अपनी RBI अवकाश सूची मानता है। दूसरे राज्यों में बैंक खुले रहते हैं, जब तक उस दिन रविवार या दूसरा या चौथा शनिवार न हो। अपना राज्य नीचे चुनकर देखें।

गुरु नानक जयंती पर किन राज्यों में सरकारी दफ़्तर बंद रहते हैं?

2026 में गुरु नानक जयंती पर उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, असम, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, तेलंगाना, पंजाब, हरियाणा, झारखंड, हिमाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़ और जम्मू और कश्मीर में राज्य सरकार के दफ़्तर बंद रहते हैं। पूरी अवकाश सूची के लिए नीचे अपना राज्य चुनें।

गुरु नानक जयंती किन राज्यों में प्रतिबंधित अवकाश है?

2026 में कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और गोवा में गुरु नानक जयंती राज्य सरकार के कर्मचारियों के लिए प्रतिबंधित (वैकल्पिक) अवकाश है: कर्मचारी छुट्टी ले सकते हैं, पर दफ़्तर खुले रहते हैं।

क्या गुरु नानक जयंती केंद्र सरकार की छुट्टी है?

हाँ। गुरु नानक जयंती 2026 में केंद्र सरकार के सभी दफ़्तरों की अनिवार्य छुट्टियों में से एक है।

क्या गुरु नानक जयंती पर शेयर बाज़ार बंद रहता है?

हाँ। मंगलवार, 24 नवंबर 2026 को NSE और BSE में ट्रेडिंग बंद रहती है।

गुरु नानक जयंती के अन्य नाम क्या हैं?

गुरु नानक जयंती को गुरपुरब, गुरु नानक गुरपुरब, प्रकाश पर्व, प्रकाश पुरब और प्रकाश उत्सव भी कहा जाता है।

गुरु नानक जयंती क्यों मनाई जाती है?

यह सिख धर्म के संस्थापक और पहले सिख गुरु, गुरु नानक देव जी के जन्म का दिन है। सिख एक ईश्वर, समानता और ईमानदार जीवन की उनकी शिक्षाओं का उत्सव मनाते हैं।

इसे प्रकाश पर्व क्यों कहते हैं?

प्रकाश का अर्थ है रोशनी। सिखों का मानना है कि गुरु नानक के जन्म ने दुनिया में सत्य और ज्ञान का प्रकाश फैलाया, इसलिए इस दिन को रोशनी का त्योहार कहते हैं।

गुरु नानक का जन्म कहाँ हुआ था?

उनका जन्म 1469 में राय भोई दी तलवंडी में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में ननकाना साहिब है। भारतीय तीर्थयात्री हर साल गुरपुरब पर वहाँ जाते हैं।

गुरु नानक की तीन मुख्य शिक्षाएँ क्या हैं?

ये हैं नाम जपना (ईश्वर का स्मरण), किरत करनी (ईमानदारी की मेहनत) और वंड छकना (दूसरों के साथ बाँटना)। ये आज भी सिखों के रोज़मर्रा जीवन का मूल हैं।

क्या उत्तराखंड में गुरु नानक से जुड़ी कोई जगह है?

हाँ। सिख परंपरा के अनुसार गुरु नानक ऊधम सिंह नगर में गुरुद्वारा नानकमत्ता साहिब और चंपावत में गुरुद्वारा रीठा साहिब वाली जगहों पर गए थे, और दोनों महत्वपूर्ण तीर्थस्थल हैं।

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