बौद्ध
बुद्ध पूर्णिमा 2027 Buddha Purnima
भगवान बुद्ध का जन्म और ज्ञान प्राप्ति
गुरुवार, 20 मई 2027
बुद्ध पूर्णिमा गौतम बुद्ध के जन्म, ज्ञान प्राप्ति और महापरिनिर्वाण का दिन है, जिसे वैशाख की पूर्णिमा को पूरे भारत के विहारों में प्रार्थना, ध्यान, दान और दीपों के साथ मनाया जाता है।
तारीख कैसे तय होती है: हिंदू चंद्र माह वैशाख की पूर्णिमा

बुद्ध पूर्णिमा क्यों मनाते हैं
बुद्ध पूर्णिमा उन गौतम बुद्ध के सम्मान का दिन है, जिनका ज्ञान और करुणा का मार्ग भारत में शुरू होकर पूरे एशिया में फैला। भारत और कई दूसरे देशों के बौद्ध मानते हैं कि उनके जीवन की तीन महान घटनाएँ वैशाख की पूर्णिमा को हुईं: उनका जन्म, उनकी ज्ञान प्राप्ति और उनका अंतिम प्रयाण, जिसे महापरिनिर्वाण कहते हैं। इसी कारण इस दिन को अक्सर त्रिविध पावन दिन कहा जाता है।
यह त्योहार बुद्ध की शिक्षा के मूल को जीवन में उतारने का आह्वान है। उन्होंने सिखाया कि दुख तृष्णा और अज्ञान से पैदा होता है, और आर्य अष्टांगिक मार्ग पर चलकर इसे ख़त्म किया जा सकता है: सम्यक दृष्टि, संकल्प, वाणी, कर्म, आजीविका, प्रयास, स्मृति और समाधि। उन्होंने अपने अनुयायियों से कहा कि वे किसी भी शिक्षा को आँख मूँदकर मानने के बजाय अपने अनुभव से परखें। इस दिन बौद्ध अहिंसा, ईमानदारी और हर जीव के प्रति दया के अपने संकल्प को दोहराते हैं।
भारत के लिए यह दिन एक साझी विरासत की भी याद दिलाता है। बुद्ध ने गंगा के मैदानों में जीवन बिताया, उपदेश दिए और वहीं देह त्यागी। सारनाथ का अशोक का सिंह शीर्ष राष्ट्रीय प्रतीक बना, और धर्म चक्र राष्ट्रीय ध्वज के केंद्र में है।
बुद्ध पूर्णिमा का इतिहास और कथा
सिद्धार्थ गौतम का जन्म शाक्य कुल के राजकुमार के रूप में लुंबिनी में हुआ था, जो आज के नेपाल में उत्तर प्रदेश की सीमा के पास है। ज़्यादातर विद्वान उनका जीवनकाल ईसा पूर्व छठी या पाँचवीं शताब्दी में मानते हैं, हालाँकि सटीक तारीख़ों पर आज भी बहस है। परंपरा कहती है कि वे कपिलवस्तु में सुख-सुविधा में पले, यशोधरा से विवाह किया और उनका एक पुत्र राहुल हुआ। एक बूढ़े व्यक्ति, एक बीमार व्यक्ति, एक शव और अंत में एक शांत भ्रमणशील संन्यासी को देखकर वे इतने विचलित हुए कि लगभग उनतीस वर्ष की आयु में मानव दुख का अंत खोजने के लिए महल छोड़ दिया।
छह वर्ष तक उन्होंने कठोर उपवास और तपस्या की, और फिर इसे बेकार रास्ता मानकर छोड़ दिया। सुजाता नाम की एक गाँव की स्त्री ने उन्हें दूध में पके चावल का कटोरा भेंट किया, और उनकी शक्ति लौट आई। बिहार के बोधगया में एक पीपल के पेड़ के नीचे बैठकर उन्होंने संकल्प लिया कि सत्य को समझे बिना नहीं उठेंगे, और एक पूर्णिमा की रात उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ। वह पेड़ बोधि वृक्ष कहलाया, और सिद्धार्थ बुद्ध बन गए, यानी जागृत व्यक्ति।
उन्होंने वाराणसी के पास सारनाथ के मृगदाव में पहला उपदेश दिया और लगभग पैंतालीस वर्ष मगध और कोसल राज्यों में घूमकर शिक्षा दी। अस्सी वर्ष की आयु में आज के उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में उनका देहांत हुआ। लुंबिनी, बोधगया, सारनाथ और कुशीनगर बौद्ध तीर्थयात्रा के चार प्रमुख स्थल बने, और बोधगया का महाबोधि मंदिर अब यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है। 1999 में संयुक्त राष्ट्र ने वेसाक के दिन को अंतरराष्ट्रीय मान्यता दी।
बुद्ध पूर्णिमा कैसे मनाते हैं
बौद्ध दिन की शुरुआत सुबह जल्दी किसी विहार या मठ जाकर करते हैं। कई लोग सफ़ेद कपड़े पहनते हैं। वे बुद्ध प्रतिमा के आगे फूल, मोमबत्तियाँ और अगरबत्ती अर्पित करते हैं, पालि, संस्कृत या तिब्बती में गाथाओं का पाठ करते हैं और पंचशील ग्रहण करते हैं: हिंसा, चोरी, व्यभिचार, झूठ और नशे से दूर रहना। भिक्षु बुद्ध के जीवन पर प्रवचन देते हैं, और उपासक ध्यान में समय बिताते हैं।
दान इस दिन का केंद्र है। भक्त भिक्षुओं को भोजन और चीवर अर्पित करते हैं, ग़रीबों को भोजन कराते हैं और मुफ़्त स्वास्थ्य शिविर लगाते हैं। सुजाता की भेंट की याद में कई घरों में खीर बनती है। कुछ लोग बोधि वृक्ष की जड़ों में जल या दूध चढ़ाते हैं और उसकी डालियों पर प्रार्थना ध्वज या दीये टाँगते हैं। एक आम अनुष्ठान है बाल बुद्ध की छोटी प्रतिमा को सुगंधित जल से स्नान कराना। ज़्यादातर लोग शाकाहारी भोजन करते हैं और शराब से दूर रहते हैं। शाम को मंदिरों और घरों में दीये जलाए जाते हैं, और कुछ समूह बुद्ध प्रतिमा और बौद्ध ध्वज के साथ शोभायात्रा निकालते हैं।
महत्वपूर्ण दिन और पल
- सुबह की प्रार्थना और पंचशील (शुक्रवार, 1 मई 2026 की सुबह)
भक्त सफ़ेद कपड़ों में विहार जाते हैं, फूल और मोमबत्तियाँ अर्पित करते हैं, सूत्रों का पाठ करते हैं और पंचशील ग्रहण करते हैं। - बुद्ध का स्नान (दिन के दौरान)
अनुयायी बाल बुद्ध की छोटी प्रतिमा पर सुगंधित जल डालते हैं, यह अनुष्ठान लुंबिनी में उनके जन्म की याद दिलाता है। - दान और खीर (दिन भर)
परिवार भिक्षुओं को भोजन और चीवर अर्पित करते हैं, ग़रीबों को भोजन कराते हैं और सुजाता की भेंट की याद में खीर बाँटते हैं। - शाम के दीये (सूर्यास्त के बाद पूर्णिमा के चाँद तले)
विहारों और घरों में दीये और मोमबत्तियाँ जलाई जाती हैं, और कई समूह ध्यान करते हैं या शोभायात्रा निकालते हैं।
भारत भर में बुद्ध पूर्णिमा
भारत में सबसे बड़ा उत्सव बोधगया में होता है, जहाँ श्रीलंका, थाईलैंड, म्यांमार, भूटान, जापान और तिब्बती समुदाय के तीर्थयात्री महाबोधि मंदिर के आसपास भारतीय भक्तों के साथ जुटते हैं। सारनाथ और कुशीनगर में शोभायात्राएँ और मेले होते हैं। सिक्किम, लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश और हिमाचल प्रदेश के कुछ हिस्सों में मठ सागा दावा मनाते हैं, यानी वह पवित्र महीना जो इन्हीं घटनाओं का सम्मान करता है, जिसमें प्रार्थनाएँ होती हैं और स्तूपों की परिक्रमा की जाती है, हालाँकि तिब्बती कैलेंडर में मुख्य दिन किसी अलग तारीख़ को पड़ सकता है। महाराष्ट्र में, जहाँ लाखों लोग उस बौद्ध धर्म को मानते हैं जिसे डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने 1956 में अपनाया था, विहारों में प्रार्थनाएँ, व्याख्यान और सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं।
देहरादून में तिब्बती बौद्ध समुदाय की मज़बूत मौजूदगी है। क्लेमेंट टाउन का मिंड्रोलिंग मठ, अपने विशाल ग्रेट स्तूप के साथ, और शहर के आसपास की तिब्बती बस्तियाँ प्रार्थना और मक्खन के दीप अर्पित करने के लिए लोगों को आकर्षित करती हैं। उत्तराखंड के कई हिंदू परिवार भी इस दिन को वैशाख पूर्णिमा के रूप में मनाते हैं, जिसमें हरिद्वार या ऋषिकेश में गंगा स्नान, सत्यनारायण कथा और दान होता है।
अन्य नाम और संबंधित त्योहार
- बुद्ध जयंती
- सागा दावा
- वैशाख पूर्णिमा
- वेसाक
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
2027 में बुद्ध पूर्णिमा कब है?
बुद्ध पूर्णिमा गुरुवार, 20 मई 2027 को है।
क्या बुद्ध पूर्णिमा पर बैंक बंद रहते हैं?
2027 की RBI बैंक अवकाश सूचियाँ अभी जारी नहीं हुई हैं; ये आमतौर पर दिसंबर या जनवरी में आती हैं। हर राज्य की अपनी सूची होती है, इसलिए तब अपने राज्य का बैंक अवकाश पेज देखें।
क्या बुद्ध पूर्णिमा केंद्र सरकार की छुट्टी है?
हाँ। बुद्ध पूर्णिमा 2027 में केंद्र सरकार के सभी दफ़्तरों की अनिवार्य छुट्टियों में से एक है।
बुद्ध पूर्णिमा के अन्य नाम क्या हैं?
बुद्ध पूर्णिमा को बुद्ध जयंती, सागा दावा, वैशाख पूर्णिमा और वेसाक भी कहा जाता है।
बुद्ध पूर्णिमा क्यों मनाई जाती है?
यह गौतम बुद्ध के सम्मान में मनाई जाती है। बौद्ध मानते हैं कि उनका जन्म, ज्ञान प्राप्ति और महापरिनिर्वाण, तीनों वैशाख की पूर्णिमा को हुए थे।
बुद्ध का जन्म कहाँ हुआ और उन्हें ज्ञान कहाँ प्राप्त हुआ?
उनका जन्म आज के नेपाल में लुंबिनी में हुआ और उन्हें बिहार के बोधगया में बोधि वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ। उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में उनका देहांत हुआ।
क्या बुद्ध पूर्णिमा और वेसाक एक ही हैं?
हाँ। श्रीलंका और दक्षिण-पूर्व एशिया के बड़े हिस्से में इसे वेसाक कहते हैं, और संयुक्त राष्ट्र इस दिन को वेसाक के रूप में मान्यता देता है।
बुद्ध पूर्णिमा पर खीर क्यों खाई जाती है?
परंपरा कहती है कि ज्ञान प्राप्ति से पहले सुजाता नाम की स्त्री ने सिद्धार्थ को दूध में पके चावल भेंट किए थे। खीर उसी भेंट की याद दिलाती है।
देहरादून में बुद्ध पूर्णिमा कहाँ देखी जा सकती है?
क्लेमेंट टाउन का मिंड्रोलिंग मठ और देहरादून के आसपास की तिब्बती बस्तियाँ प्रार्थना और दीप अर्पण का आयोजन करती हैं।
अगले 30 दिनों के बौद्ध त्योहार
अगले 30 दिनों में कोई और त्योहार नहीं।
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- मंगल, 20 अक्टू
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छठ पूजा
- मंगल, 24 नवं
गुरु नानक जयंती